
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि बेंगलुरु में स्थित प्रसिद्ध हरे कृष्ण मंदिर इस्कॉन बैंगलोर की संपत्ति है, न कि इस्कॉन मुंबई की। इस फैसले के साथ ही करीब 15 साल से चल रहा कानूनी विवाद खत्म हो गया।
क्या है मामला?
बेंगलुरु के राजाजीनगर में स्थित हरे कृष्ण मंदिर और इसके साथ बने शैक्षणिक परिसर को लेकर इस्कॉन बैंगलोर और इस्कॉन मुंबई के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। दोनों ही संस्थाएं खुद को इस मंदिर की असली मालिक बता रही थीं।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
बता दें कि साल 2009 बेंगलुरु की एक स्थानीय अदालत ने फैसला दिया कि मंदिर इस्कॉन बैंगलोर की संपत्ति है और इस्कॉन मुंबई को वहां दखल देने से रोका। फिर साल 2011 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह फैसला पलटते हुए कहा कि मंदिर असल में इस्कॉन मुंबई के अधिकार क्षेत्र में आता है। साल 2011 में ही इस फैसले के खिलाफ इस्कॉन बैंगलोर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
15 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इस्कॉन बैंगलोर के पक्ष में फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति एएस ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह निर्णय दिया।
क्या कहते हैं दोनों पक्ष?
इस्कॉन बैंगलोर का कहना है कि वह कई दशकों से मंदिर और उसके कामकाज को स्वतंत्र रूप से चला रही है। यह संस्था कर्नाटक में पंजीकृत है और इसका खुद का प्रबंधन तंत्र है। इस्कॉन मुंबई का दावा था कि इस्कॉन बैंगलोर उसकी एक शाखा मात्र है और मंदिर की असली मालिक वही है क्योंकि वह राष्ट्रीय संस्था के रूप में पहले से पंजीकृत है।
अब क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब बेंगलुरु के हरे कृष्ण मंदिर का पूरा नियंत्रण इस्कॉन बैंगलोर के पास रहेगा। इस फैसले को धार्मिक, कानूनी और प्रबंधन के नजरिए से काफी अहम माना जा रहा है।
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