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जानिए क्या है Artificial Rain, कैसे करती है काम, क्लाउड सीडिंग और प्रदूषण कम करने में कितनी है कारगर?

नई दिल्ली: सर्दियों में खासकर बड़े शहरों में दमघोंटू हवा एक बड़ी चुनौती बन गई है। इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक नए-नए तरीके खोज रहे हैं, जिनमें से एक है ‘कृत्रिम बारिश’। भीषण वायु प्रदूषण से जूझ रहे दिल्ली जैसे शहर इस तकनीक को आजमाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और इसके परीक्षण भी हो रहे हैं।

लेकिन यह कृत्रिम बारिश क्या है? क्या वाकई आसमान से पानी बरसाया जा सकता है? यह कैसे बनती है और क्या वाकई यह प्रदूषण का रामबाण इलाज साबित हो सकती है? आइए इन सभी सवालों के जवाब आसान भाषा में समझते हैं।

Artificial Rain की आवश्यकता क्यों है?

Artificial Rain मुख्यतः दो कारणों से की जाती है:

1. सूखे से निपटना: उन क्षेत्रों में पानी की कमी को पूरा करना जहाँ लंबे समय से बारिश नहीं हुई है।

2. वायु प्रदूषण कम करना: जब शहरों में वायु की गुणवत्ता बेहद खराब हो जाती है, तो वर्षा के माध्यम से प्रदूषकों को कम करना (जैसा कि दिल्ली में विचार किया जा रहा है)। दिल्ली में, सर्दियों के दौरान PM2.5 और PM10 का स्तर अक्सर ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुँच जाता है, जिससे स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।

Artificial Rain कैसे की जाती है? (क्लाउड सीडिंग का विज्ञान)

सबसे पहले, यह समझना ज़रूरी है कि क्लाउड सीडिंग से वर्षा ‘उत्पन्न’ नहीं होती, बल्कि पहले से मौजूद बादलों को वर्षा के लिए ‘उत्तेजित’ किया जाता है।

1. आवश्यक सामग्री: इसके लिए, सिल्वर आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक) जैसे कुछ रसायनों के सूक्ष्म कणों को विमान या रॉकेट के माध्यम से बादलों में छिड़का जाता है।

2. बादल कैसे बरसते हैं:

ये रासायनिक कण हवा में मौजूद नमी (जलवाष्प) के लिए ‘नाभिक’ का काम करते हैं।

1. नमी इन कणों के चारों ओर जमा होकर छोटी-छोटी पानी की बूंदों का निर्माण करती है।

2. धीरे-धीरे, ये बूंदें आपस में मिलकर बड़ी और भारी हो जाती हैं।

3. जब ये बूंदें इतनी भारी हो जाती हैं कि बादल उन्हें रोक नहीं पाता, तो वे बारिश के रूप में बरसती हैं।

4. शर्तें लागू: यह तकनीक तभी सफल होती है जब:

4.1 आकाश में पहले से ही बादल हों।

4.2 उन बादलों में पर्याप्त नमी हो (आमतौर पर 50% से ज़्यादा)।

4.3 बादलों का घनत्व सही हो। (यदि बूंदें बहुत छोटी रह जाती हैं, तो वे ज़मीन पर पहुँचने से पहले ही वाष्पित हो सकती हैं)।

दिल्ली में परीक्षण और आईआईटी कानपुर की भूमिका

दिल्ली सरकार वायु प्रदूषण से निपटने के लिए आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों के साथ मिलकर Artificial Rain की संभावना तलाश रही है।

1. परीक्षण उड़ानें: इसके लिए दिल्ली के कुछ इलाकों (जैसे बुराड़ी) के ऊपर परीक्षण उड़ानें आयोजित की गई हैं। इन उड़ानों में, एक विमान (सेसना विमान) से सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड (‘पाइरो तकनीक’) के फ्लेयर्स छोड़े गए।

2. आर्द्रता की चुनौती: हालाँकि, परीक्षणों के दौरान, हवा में आवश्यक आर्द्रता की कमी के कारण तुरंत बारिश नहीं हो सकी, लेकिन इससे तकनीक की तैयारी और समन्वय का परीक्षण करने में मदद मिली।

क्या इससे प्रदूषण कम होगा?

क्लाउड सीडिंग सीधे तौर पर प्रदूषक कणों को खत्म नहीं करती, लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से हवा को साफ करने में मदद कर सकती है।

1. ‘वाशआउट’ प्रभाव: जब बारिश होती है, तो पानी की बूंदें हवा में मौजूद PM2.5, PM10, धूल, पराग और अन्य प्रदूषकों को घोलकर या चिपकाकर ज़मीन पर गिरा देती हैं। इससे बारिश के बाद हवा की गुणवत्ता में सुधार होता है।

2. कितना प्रभावी: इसका प्रभाव बारिश की तीव्रता और अवधि पर निर्भर करता है।

चुनौतियाँ और वैश्विक उपयोग

1. मौसम पर निर्भरता: कृत्रिम वर्षा की सफलता पूरी तरह से मौसम (बादलों और नमी की उपस्थिति) पर निर्भर करती है।

2. लागत और पर्यावरण: यह एक महंगी तकनीक है और इसमें इस्तेमाल होने वाले रसायनों (विशेषकर सिल्वर आयोडाइड) के संभावित दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का भी अध्ययन और बहस चल रही है।

3. वैश्विक उपयोग: इन चुनौतियों के बावजूद, चीन, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और थाईलैंड जैसे कई देश सूखे से निपटने, जल भंडार को फिर से भरने, मौसम बदलने या (चीन के मामले में) ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों से पहले हवा को साफ करने के लिए क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं।

दिल्ली के अधिकारी अब वास्तविक क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन के लिए अनुकूल मौसम की स्थिति का इंतजार कर रहे हैं और देख रहे हैं कि यह राजधानी की जहरीली हवा को कितना कम कर सकता है।

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