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विश्व होम्योपैथी दिवस: भारत में तेजी से बढ़ रहा भरोसा, क्रॉनिक बीमारियों में होम्योपैथी बनी पसंदीदा विकल्प

World Homeopathy Day

भारत की होम्योपैथी में बढ़ती पहचान, कम लागत में अच्छें इलाज का विकल्प

नई दिल्लीः विश्व होम्योपैथी दिवस के अवसर पर देशभर में होम्योपैथी को लेकर बढ़ती स्वीकार्यता और इसके विस्तार पर चर्चा तेज हो गई है। खासतौर पर क्रॉनिक और गैर-संक्रामक बीमारियों के प्रबंधन में यह पद्धति एक महत्वपूर्ण पूरक चिकित्सा प्रणाली के रूप में उभर रही है। भारत में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, जहां बड़ी संख्या में मरीज प्राकृतिक और होलिस्टिक इलाज की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, बढ़ती मांग के बावजूद अनुसंधान, पारदर्शिता और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियां भी सामने हैं।

इन्हीं पहलुओं पर बात करने के लिए हमने बातचीत की पद्म श्री पुरस्कार विजेता और डॉ. कल्याण बनर्जी क्लिनिक के संस्थापक डॉ. कल्याण बनर्जी व डॉ. कुशल बनर्जी से जिन्होंने देश में होम्योपैथी के बढ़ते प्रभाव, इसके वैज्ञानिक आधार और भविष्य की संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए।

1-सवाल- भारत में होम्योपैथी की लोकप्रियता कितनी बढ़ी है?
जवाब- पिछले कुछ वर्षों में भारत में होम्योपैथी और अन्य आयुष पद्धतियों की लोकप्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में आयुष सेक्टर कई गुना बढ़ा है और अब यह हेल्थकेयर का एक बड़ा और संगठित हिस्सा बन चुका है। लोगों का प्राकृतिक और समग्र (होलिस्टिक) इलाज की ओर झुकाव, सरकार की सक्रिय नीतियां और बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता इसके प्रमुख कारण हैं। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े होम्योपैथी नेटवर्क वाले देशों में गिना जाता है, जहां लाखों मरीज इस पद्धति का उपयोग कर रहे हैं।

2- सवाल- लोग एलोपैथी की बजाय होम्योपैथी क्यों चुन रहे हैं?
जवाब- आज के समय में लोग कई वजहों से एलोपैथी की बजाय होम्योपैथी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसे प्राकृतिक और कम साइड-इफेक्ट वाली चिकित्सा पद्धति माना जाता है, जो शरीर के संतुलन को बनाए रखते हुए इलाज करने का दावा करती है। क्रॉनिक बीमारियों में लंबे समय तक राहत देने की इसकी धारणा, प्रत्येक मरीज के अनुसार व्यक्तिगत इलाज और अपेक्षाकृत कम लागत भी लोगों को इसकी ओर खींचती है। पोस्ट-कोविड दौर में इम्यूनिटी और प्रिवेंटिव हेल्थ पर बढ़ते फोकस ने भी होम्योपैथी की मांग को बढ़ाया है।

3-सवाल- क्या क्रॉनिक बीमारियों में होम्योपैथी बेहतर विकल्प है?
जवाब- होम्योपैथी का उपयोग विशेष रूप से क्रॉनिक बीमारियों जैसे एलर्जी, त्वचा रोग, माइग्रेन और आर्थराइटिस में किया जाता है। हालांकि इसे “बेहतर विकल्प” कहना हर मामले में सही नहीं होगा, क्योंकि यह पूरी तरह मरीज की स्थिति और बीमारी की प्रकृति पर निर्भर करता है। कई मरीजों को इससे राहत मिलती है, लेकिन गंभीर या आपातकालीन स्थितियों में एलोपैथी की भी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहती है। वर्तमान समय में “इंटीग्रेटेड अप्रोच”, यानी दोनों चिकित्सा प्रणालियों का संतुलित उपयोग, अधिक प्रभावी माना जा रहा है।

4-सवाल- इलाज में कितना समय लगता है?
जवाब- होम्योपैथी में इलाज का समय कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे बीमारी की अवधि, मरीज की इम्यूनिटी, शरीर की प्रतिक्रिया, जीवनशैली और सही दवा का चयन। आमतौर पर एक्यूट बीमारियों जैसे सर्दी या बुखार में इसका असर जल्दी दिख सकता है, जबकि क्रॉनिक बीमारियों में इलाज में कई महीनों का समय लग सकता है। इसलिए इसका परिणाम व्यक्ति-विशेष के अनुसार भिन्न हो सकता है।

5-सवाल- “क्या होम्योपैथी धीरे काम करती है?, इस पर राय
यह धारणा काफी आम है कि होम्योपैथी धीमी गति से काम करती है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। एक्यूट कंडीशन्स में होम्योपैथी दवाएं तेजी से असर दिखा सकती हैं, जबकि क्रॉनिक मामलों में यह बीमारी की जड़ तक पहुंचकर धीरे-धीरे सुधार करने का प्रयास करती है। इसलिए इसका असर बीमारी की प्रकृति और शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है, न कि केवल चिकित्सा पद्धति पर।

6-सवाल- क्या बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित है?
जवाब- सामान्यतः होम्योपैथी को सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसकी दवाएं अत्यधिक डायल्यूट होती हैं। बच्चों में एलर्जी, पाचन संबंधी समस्याएं और सामान्य बीमारियों में इसका उपयोग किया जाता है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी कई विशेषज्ञ इसे सुरक्षित विकल्प मानते हैं, लेकिन किसी भी प्रकार का इलाज हमेशा योग्य और प्रमाणित डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार का जोखिम न हो।

7-सवाल- आयुष पॉलिसी से कितना फायदा मिला है?
जवाब- सरकार की आयुष नीतियों ने इस क्षेत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बजट में लगातार वृद्धि, रिसर्च और शिक्षा संस्थानों का विस्तार, अस्पतालों की संख्या में बढ़ोतरी और बीमा योजनाओं में आयुष उपचार को शामिल किए जाने से इस सेक्टर को व्यापक लाभ मिला है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की पहचान मजबूत हुई है, लेकिन सरकार को अभी भी आयुष नीतियों को और मजबूत करने की जरूरत है।

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