Hukamnama: सलोक मः १ ॥ ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥ ना सति मूंड मुडाई केसी ना सति पड़िआ देस फिरहि ॥ ना सति रुखी बिरखी पथर आपु तछावहि दुख सहहि ॥ ना सति हसती बधे संगल ना सति गाई घाहु चरहि ॥ जिसु हथि सिधि देवै जे सोई जिस नो देइ तिसु आइ मिलै ॥ नानक ता कउ मिलै वडाई जिसु घट भीतरि सबदु रवै ॥ सभि घट मेरे हउ सभना अंदरि जिसहि खुआई तिसु कउणु कहै ॥ जिसहि दिखाला वाटड़ी तिसहि भुलावै कउणु ॥ जिसहि भुलाई पंध सिरि तिसहि दिखावै कउणु ॥१॥
अर्थ : (तपस्या आदिक से ) दुखी होने में (सिद्धि और प्रशंसा की प्राप्ति ) नहीं है, सुखी -रहना में भी सिद्धि की प्राप्ति नहीं है, और न ही पानी में खड़े रहने से (नहीं तो बेअंत ) जीव जो पानी में रहते हैं ( उनको केवल सोते हुए ही सिद्धि प्राप्त हो जाती)। सिर के केस काटने में (भावार्थ रंड मुंड होने में भी ) सिद्धि नहीं है; इस बात में भी (जन्म मनोरथ की सिद्धि नहीं है ) कि विद्वान् बन कर (और लोगों से चर्चा में जितने के लिए ) देश विदेश यात्रा की जाए। रुख वृक्ष और पत्थर आदिक में भी सिद्धि नहीं है, यह अपने आप को काटते (कटवाते) हैं (कई प्रकार के दुःख सहारते हैं (भावार्थ रुख वृक्ष पत्थर आदिक की भांति जड़ हो कर अपने ऊपर कई कष्ट सहारने से जन्म मनोरथ की सिद्धि प्राप्त नहीं होती । बेड़ियाँ कमर में बांधने से भी सिद्धि नहीं होती (हाथी बेड़ियों से बंधे ही रहते हैं !, (कंद मूल आदिक खाने में भी ) सिद्धि नहीं है, गाय आदिक घास खाती हैं ( भावार्थ हाथी की तरह बेड़ियों में बंधने से और गाय की तरह घास खाने से भी सिद्धि नहीं मिलती। जिस प्रभु के हाथ में सफलता है अगर वो आप दे तो ही जिस को वो देता है उसी को प्राप्त होती है। हे नानक! प्रशंसा उसी जीव को मिलती है जिस के हृदय में (प्रभु की सिफत-सलाह का) शब्द हर समय मौजूद है। (प्रभु तो यूँ कहता है की जीवों के सारे सरीर मेरे (शरीर ) है, मैं सभ में बस्ता हूँ, जिस जीव को कु-राह पर डाल दूँ उस को कौन समझा सकता है ? जिस को मैं सही राह दिखा दूं , उस को राह कौन भुला सकता है? और जिस को जिंदगी के शुरू मैं ही मैं राह भुला दूँ उस को राह कौन दिखा सकता है?
मेष: दिन शुभ रहेगा...