Adhik Maas: हिंदू पंचांग में हर कुछ वर्षों के अंतराल पर एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। यह सामान्य बारह महीनों से अलग माना जाता है और इसी कारण इस दौरान विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को करने की परंपरा प्रचलित नहीं है। आइए समझते हैं कि यह महीना क्या है, इसमें शुभ कार्य क्यों वर्जित माने जाते हैं और इसका धार्मिक महत्व क्या है…
अधिक मास क्या होता है?
हिंदू कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, जबकि मौसम और ऋतुएं सूर्य की गति के अनुसार चलती हैं। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का। दोनों में लगभग 11 दिनों का अंतर हर साल बनता जाता है।
इस अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग ढाई से तीन वर्षों में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। यह वह समय होता है जब किसी चंद्र महीने के दौरान सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता। इसी कारण उसे विशेष अतिरिक्त मास माना जाता है।
अधिक मास में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते?
परंपराओं के अनुसार अधिक मास को पहले मलमास कहा जाता था, जिसे सामान्य शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। मान्यता है कि वर्ष के बारह महीनों में हर महीने का एक विशेष देवता होता है, लेकिन इस अतिरिक्त महीने का कोई निश्चित अधिपति नहीं था।
इसी वजह से इसे सामान्य मांगलिक कार्यों के लिए अनुपयुक्त समझा गया। बता दें कि विवाह, सगाई, मुंडन, गृहप्रवेश या नए व्यापार की शुरुआत जैसे कार्य इस अवधि में टालने की परंपरा बन गई। ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस समय को स्थिर परिणाम देने वाला नहीं माना जाता।
हालांकि यह ध्यान देने योग्य है कि यह रोक केवल शुभ और नए आरंभों पर लागू होती है। रोजमर्रा के कार्य जैसे कामकाज, भोजन, यात्रा या सामान्य जीवन पर किसी प्रकार की रोक नहीं होती।
पुरुषोत्तम मास की धार्मिक मान्यता
पुराणों में अधिक मास से जुड़ी कई कथाएं मिलती हैं। एक मान्यता के अनुसार, जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया तो उसे कोई भी देवता अपनाने को तैयार नहीं था, क्योंकि इसमें शुभ कार्य नहीं होते थे। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा।
भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम और संरक्षण दिया और तब से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा। इस महीने को भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दौरान व्रत, पूजा, दान और ध्यान को विशेष फलदायी बताया गया है।
एक अन्य कथा में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस मास में किए गए आध्यात्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़कर मिलता है, जबकि भौतिक और मांगलिक कार्यों को स्थगित करना बेहतर माना जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। दैनिक सवेरा टाइम्स एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

