Last Updated: October 3, 2026

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Asha Dashami 2026: कब रखा जाएगा आशा दशमी का व्रत? जानें इसका महत्व और व्रत रखने के जरूरी नियम

July 3, 2026

Asha Dashami 2026: कब रखा जाएगा आशा दशमी का व्रत? जानें इसका महत्व और व्रत रखने के जरूरी नियम

Asha Dashami 2026: हिंदू धर्म में आशा दशमी का व्रत विशेष महत्व रखता है। यह व्रत आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी पार्वती और दसों दिशाओं की अधिष्ठात्री देवियों की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और मन की इच्छाएं पूरी होने का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानते हैं कि इस वर्ष आशा दशमी का व्रत कब रखा जाएगा, इसका धार्मिक महत्व क्या है और पूजा कैसे की जाती है।

आशा दशमी व्रत 2026 कब है?

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि 23 जुलाई 2026 को सुबह 7:03 बजे शुरू होगी और 24 जुलाई 2026 को सुबह 9:12 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर इस साल आशा दशमी का व्रत 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।

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आशा दशमी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आशा दशमी का व्रत खास तौर पर सुहागिन महिलाओं के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन मां पार्वती की पूजा करने से शादीशुदा जीवन में सुख और शांति बनी रहती है। साथ ही, दसों दिशाओं की देवियों की पूजा करने से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और मन की इच्छाएं पूरी होने की मान्यता है। यह भी माना जाता है कि अगर किसी महिला के पति उससे दूर रहते हैं, तो इस व्रत के प्रभाव से उनके दोबारा साथ आने और वैवाहिक जीवन में खुशियां लौटने की संभावना बढ़ती है।

आशा दशमी की पूजा कैसे करें?

व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूरे श्रद्धाभाव से व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थान को साफ करके लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर मां पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। फिर रोली, चंदन, फूल, धूप, दीप और खीर का भोग अर्पित करें। इसके साथ ही आशा देवियों का ध्यान करें और व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें। पूजा पूरी होने के बाद अपनी क्षमता के अनुसार दान करें और दिनभर सात्विक भोजन का पालन करें।

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व्रत से जुड़े जरूरी नियम

धार्मिक परंपरा के अनुसार, आशा दशमी व्रत को लगातार छह महीने या एक से दो वर्ष तक करने का विधान बताया गया है। इसकी शुरुआत आषाढ़ शुक्ल पक्ष से करना शुभ माना जाता है, हालांकि इसे किसी भी शुक्ल पक्ष से आरंभ किया जा सकता है। व्रत की अवधि पूरी होने पर विधि-विधान से उद्यापन करना चाहिए। इस अवसर पर सुहागिन महिलाओं के साथ रात्रि जागरण करने और ब्राह्मणों, गरीबों व जरूरतमंद लोगों को दान देने का भी विशेष महत्व माना गया है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। दैनिक सवेरा टाइम्स एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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