Last Updated: September 22, 2026

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Baishakhi 2026: 14 अप्रैल को ही क्यों मनाया जाता है यह पर्व? जानिए इतिहास, महत्व और परंपराएं

April 14, 2026

Baishakhi 2026: 14 अप्रैल को ही क्यों मनाया जाता है यह पर्व? जानिए इतिहास, महत्व और परंपराएं

Baishakhi 2026: बैसाखी भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे हर साल 14 अप्रैल को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। खासतौर पर पंजाब और हरियाणा में इसकी रौनक देखते ही बनती है। बता दें कि यह पर्व नई फसल की खुशियों, समृद्धि और नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। सिख समुदाय के लिए बैसाखी का धार्मिक महत्व भी बेहद खास है। तो आइए जानते हैं इस बैसाखी मनाने के पीछे की मान्यता और इतिहास के बारे में…

14 अप्रैल को ही क्यों मनाई जाती है बैसाखी?

बैसाखी का संबंध सौर कैलेंडर से है। इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जिसे भारतीय नववर्ष की शुरुआत माना जाता है। इसी कारण हर साल यह पर्व लगभग 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है, और अधिकतर वर्षों में यह 14 अप्रैल को ही पड़ता है।

सिख इतिहास में बैसाखी का महत्व

सिख परंपरा के अनुसार, 1699 में इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। यह घटना सिख इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस दिन उन्होंने सभा में उपस्थित लोगों से धर्म की रक्षा के लिए बलिदान मांगा। तब पांच व्यक्तियों ने आगे आकर अपना जीवन समर्पित करने की इच्छा जताई। इन्हें बाद में “पंज प्यारे” के रूप में सम्मान दिया गया और यही खालसा पंथ के पहले सदस्य बने।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को समानता, साहस और मानवता का संदेश दिया। उन्होंने पुरुषों को “सिंह” और महिलाओं को “कौर” नाम के साथ जोड़ने की परंपरा भी शुरू की, जिससे जाति-पाति के भेदभाव को समाप्त किया जा सके।

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कृषि से जुड़ा महत्व

बैसाखी किसानों के लिए भी बेहद खास दिन होता है। इस समय तक रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है। किसान अपनी मेहनत के फल की खुशी में यह त्योहार मनाते हैं। यह दिन उनके लिए नई उम्मीद और समृद्धि का प्रतीक होता है।

बैसाखी कैसे मनाई जाती है?

-इस दिन लोग सुबह पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान करते हैं और गुरुद्वारों में मत्था टेकते हैं। गुरुद्वारों को सजाया जाता है और विशेष कीर्तन, अरदास तथा गुरुवाणी का आयोजन होता है।

-नगर कीर्तन निकाले जाते हैं, जिनमें “पंज प्यारे” अग्रणी भूमिका निभाते हैं। जगह-जगह लंगर आयोजित किए जाते हैं, जहां सभी लोग मिलकर भोजन करते हैं।

-शाम के समय लोग पारंपरिक नृत्य जैसे भांगड़ा और गिद्धा करते हैं। घरों में कड़ा प्रसाद, मीठे चावल और अन्य स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं। पंजाब के ग्रामीण इलाकों में मेले भी लगते हैं, जो इस त्योहार की खुशी को और बढ़ा देते हैं।

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। दैनिक सवेरा टाइम्स इस बारे में किसी तरह की कोई पुष्टि नहीं करता है। इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है।)

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