Daily Hukamnama: बाईस चउपदे तथा पंचपदे आसा स्री कबीर जीउ के तिपदे ८ दुतुके ७ इकतुका १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ बिंदु ते जिनि पिंडु कीआ अगनि कुंड रहाइआ ॥ दस मास माता उदरि राखिआ बहुरि लागी माइआ ॥१॥ प्रानी काहे कउ लोभि लागे रतन जनमु खोइआ ॥ पूरब जनमि करम भूमि बीजु नाही बोइआ ॥१॥ रहाउ ॥ बारिक ते बिरधि भइआ होना सो होइआ ॥ जा जमु आइ झोट पकरै तबहि काहे रोइआ ॥२॥ जीवनै की आस करहि जमु निहारै सासा ॥ बाजीगरी संसारु कबीरा चेति ढालि पासा ॥३॥१॥२३॥
Daily Hukamnama अर्थ :- जिस भगवान ने (पिता की) एक बूंद से (तेरा) शरीर बना दिया, और (माँ के पेट की) अग्नि के कुंड में तुझे बचाए रखा, दस महीने माँ के पेट में तेरी रक्षा की, (उस को भुलाने कर के) जगत में जन्म ही ही तुझे माया ने आ दबाया है।1। हे मनुख ! क्यों लोभ में फँस रहा हैं और हीरा-जन्म गवा रहा हैं ? पिछले जन्म में (कीये) कर्मो-अनुसार (मिले इस मनुखा-) शरीर में क्यों तूँ भगवान का नाम-रूप बीज नहीं बीजता ?।1।रहाउ। अब तूँ बालक से बुढा हो गया हैं, पिछला बिता हुआ समय हाथ नहीं आएगा। जिस समय यम सिर को आ पकड़ेगा, तब रोने का क्या लाभ होगा ?।2। (बुढा हो के अभी भी) तूँ (ओर) जीवन की आशांए बना रहा हैं, (और उधर) यम तेरे साँस ताक रहा है (भावार्थ, गिन) रहा है कि कब ख़त्म हों। हे कबीर ! जगत नट की खेल ही है, (इस खेल में जितने के लिए) भगवान की याद का पासा फेंक (भगवान की याद की खेल खेलो)।3।1।23।
मेष: दिन शुभ रहेगा...