
7 जनवरी दिन रविवार को सफला एकादशी व्रत रखा जा रहा है। इस व्रत के आराध्य भगवान नारायण हैं। इस दिन अगर, नारियल, सुपारी, आंवला, अनार तथा लौंग आदि से श्री नारायण जी का पूजन किया जाता है। इस दिन दीपदान तथा रात्रि जागरण का बड़ा महात्म्य है। आइए जानते है इस व्रत की कथा के बारे में:
कथा: राजा महिषमति के चार बेटे थे। सबसे छोटा ल्युंक बड़ा दुष्ट तथा पापी था। वह पिता के धन को कुकर्मों से नष्ट करता था। दुखी होकर राजा ने उसे अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। जंगलों में भटकते हुए भी उसने अपनी पुरानी आदतें न छोड़ीं। एक बार उसे लूटमार के दौरान तीन दिन पर्यंत भूखे रहना पड़ा। भूख से दुखी होकर उसने एक साधु की कुटिया पर डाका डाल दिया। उस दिन ‘सफला एकादशी’ थी।
उसे वहां कुछ भी खाने को न मिल सका। महात्मा ने उसे वस्त्रादि दिए तथा सद्भावना से मीठी वाणी से उसका सत्कार किया। महात्मा के इस व्यवहार से उसकी बुद्धि में परिवर्तन आ गया। वह सोचने लगा कि ‘कितना अच्छा मनुष्य है! मैं आया तो इसके घर चोरी करने था पर इसने मेरा सत्कार किया। मैं भी तो मनुष्य ही हूं। कितना दुराचारी तथा पापी हूं!’ उसे अपनी भूल का एहसास हो गया। वह क्षमा याचना करता हुआ साधु के चरणों में गिर पड़ा। साधु की सलाह से ल्युंक वहीं रहने लगा। अब वह साधु द्वारा लाई गई भिक्षा से जीवन-यापन करता था।
धीरे-धीरे उसके चरित्र के सारे दोष दूर हो गए। वह महात्मा की आज्ञा से ‘एकादशी’ का व्रत करने लगा। जब वह बिल्कुल बदल गया तो महात्मा ने उसके सामने अपना असली रूप प्रकट किया। महात्मा के वेश में वह स्वयं महाराज महिषमति ही थे। पुत्र को सद्गुणों से युक्त देखकर वह उसे राजभवन ले आए। उन्होंने उसे राजकाज सौंप दिया। प्रजा भी उसके चरित्र में परिवर्तन देखकर हैरान हुई। उसने सारा राजकाज संभालकर आदर्श प्रस्तुत किए। ल्युंक आजीवन सफला एकादशी का व्रत तथा प्रचार करता रहा।
मेष: दिन शुभ रहेगा...