Hukamnama 07 Oct 2025 : बिलावलु महला १ ॥ मन का कहिआ मनसा करै ॥ इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥ माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥ त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥१॥ तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥ बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥१॥ रहाउ ॥ कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥ धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥ खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥ बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥२॥
Hukamnama 07 Oct 2025 अर्थ: (प्रभु-नाम से बिसरे हुए मनुख की) बुद्धि (भी) मन के कहे अनुसार चलती है, और यह मन केवल यही बातें सोचता है की (शास्त्रों की मर्यादा अनुसार) पुन्य क्या है और पाप क्या है। माया के नशे में मस्त हुए मनुख को (माया की तरफ) से सब्र नहीं होता। माया का सब्र और माया के मोह से खलासी तभी होती है जब मनुख को सदा-थिर रहने वाला प्रभु मन में प्यारा लगने लग जाता है॥१॥ हे अभिमानी जीव! देख, यह शरीर, यह धन, यह स्त्री-यह सब (सदा साथ निभने वाले नहीं है)। परमात्मा के नाम के बिना कोई वस्तु (जीव के) साथ नहीं जाती॥१॥रहाउ॥ हम माया के रस का भोग करते हैं, माया की मौज मनाते हैं, (परन्तु मौत आने पर) धन (ओर) लोगों का बन जाता है और यह शारीर मिटटी की ढेरी हो जाता है। यह सारा ही पसारा (अंत) मिटटी में मिल जाता है। (मन पर विषे-विकारों की मैल इकठ्ठा होती रहती है, वह) मैल गुरु के शब्द के बिना नहीं उत्तरती॥२॥

