Hukamnama 16 Sept 2026: गूजरी महला ५ ॥ जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥ पारब्रहमु जिनि रिदै अराधिआ तिनि भउ सागरु तरिआ ॥१॥ गुर हरि बिनु को न ब्रिथा दुखु काटै ॥ प्रभु तजि अवर सेवकु जे होई है तितु मानु महतु जसु घाटै ॥१॥ रहाउ ॥ माइआ के सनबंध सैन साक कित ही कामि न आइआ ॥ हरि का दासु नीच कुलु ऊचा तिसु संगि मन बांछत फल पाइआ ॥२॥ लाख कोटि बिखिआ के बिंजन ता महि त्रिसन न बूझी ॥ सिमरत नामु कोटि उजीआरा बसतु अगोचर सूझी ॥३॥ फिरत फिरत तुम्हरै दुआरि आइआ भै भंजन हरि राइआ ॥ साध के चरन धूरि जनु बाछै सुखु नानक इहु पाइआ ॥४॥६॥७॥ {पन्ना 497}
Hukamnama 16 Sept 2026 अर्थ: हे भाई! गुरू के बिना परमात्मा के बिना कोई और (किसी का) दुख-दर्द नहीं काट सकता। परमात्मा (का विभाग) छोड़ के अगर किसी और के सेवक बनें तो इस काम में इज्जत वडिआई और शोभा कम हो जाती है।1। रहाउ। हे भाई! मैं जिस भी मनुष्य के पास (अपने दुख की) बात करता हूँ, वह (पहले ही) अपने दुख से भरा हुआ दिखता है (वह मेरा दुख क्या निर्वित करे?)। हे भाई! जिस मनुष्य ने अपने हृदय में परमात्मा को आराधा है, उस ने ही ये डर (-भरा संसार-) समुंद्र पार किया है।1। हे भाई! माया के कारण बने हुए ये साक-सज्जन-रिश्तेदार (दुखों की निर्वित्ती के लिए) कोई भी काम नहीं आ सकते। परमात्मा का भगत अगर नीच कुल का भी हो, उसको श्रेष्ठ जानो, उसकी संगति में रहने से मन-इच्छित फल हासिल कर लेते हैं।2। हे भाई! अगर माया के लाखों-करोड़ों स्वादिष्ट व्यंजन हों, उनमें लगने (खाने की) तृष्णा नहीं खत्म होती। परमात्मा का नाम सिमरने से (अंदर, जैसे) करोड़ों (सूरजों का) प्रकाश हो जाता है, और अंदर वह कीमती पदार्थ दिखाई दे जाता है जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती।3। हे नानक! (कह–) हे प्रभू पातशाह! हे जीवों के सारे डर नाश करने वाले हरी! जो मनुष्य भटकता-भटकता (आखिर) तेरे दर पर आ पहुँचता है वह (तेरे दर से) गुरू के चरणों की धूड़ मांगता है, (और तेरे दर से) ये सुख प्राप्त करता है।4।6।7।

