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हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 30 नवंबर 2025

November 30, 2025

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 30 नवंबर 2025

Hukamnama: सलोकु महला २ ॥ चाकरु लगै चाकरी नाले गारबु वादु ॥ गला करे घणेरीआ खसम न पाए सादु ॥ आपु गवाइ सेवा करे ता किछु पाए मानु ॥ नानक जिस नो लगा तिसु मिलै लगा सो परवानु ॥१॥ महला २ ॥ जो जीइ होइ सु उगवै मुह का कहिआ वाउ ॥ बीजे बिखु मंगै अंम्रितु वेखहु एहु निआउ ॥२॥ महला २ ॥ नालि इआणे दोसती कदे न आवै रासि ॥ जेहा जाणै तेहो वरतै वेखहु को निरजासि ॥ वसतू अंदरि वसतु समावै दूजी होवै पासि ॥ साहिब सेती हुकमु न चलै कही बणै अरदासि ॥ कूड़ि कमाणै कूड़ो होवै नानक सिफति विगासि ॥३॥

अर्थ :- जो कोई नौकर अपने स्वामी की नौकरी भी करे, और उसके साथ के साथ अपने स्वामी के आगे अकड़ की बाते भी करता जाए और इस प्रकार की बाहरली बातें स्वामी के सामने करे, तो वह नौकर स्वामी की खुशी हासिल नहीं कर सकता। मनुख अपना आप मिटा के (स्वामी की) सेवा करे तो ही उस को (स्वामी के दर से) कुछ आदर मिलता है, तो ही, हे नानक ! वह मनुख अपने उस स्वामी को मिल सकता है जिस की सेवा में लगा हुआ है। (अपना आप गँवा के सेवा में) लगा हुआ मनुख ही (स्वामी के दर पर) कबूल होता है।1। जो कुछ मनुख के दिल में होता है, वही प्रकट होता है, (भावार्थ, जैसी मनुख की नीयत होती है, वैसा ही उस को फल लगता है), (अगर अंदर नीयत कुछ ओर हो, तो उस के उलट) मुख से कह देना व्यर्थ है। यह कैसी अचरज की बात है कि मनुख बीजता तो ज़हर है (भावार्थ, नीयत तो विकारों की तरफ है) (पर उस के फल के रूप में) माँगता अमृत है।2। कोई भी मनुख परख के देख लए, किसी अंजान के साथ लाई हुई मित्रता कभी सिरे नहीं चड़ती, किउंंकि उस अंजान का रवईआ उसी प्रकार का ही रहता है जिहो जही उस की समझ होती है; (इसी प्रकार इस मूर्ख मन के आखे लगने से कभी लाभ नहीं होता, यह मन अपनी समझ अनुसार विकारों की तरफ ही के लिए घूमता है)। किसी एक चीज में कोई ओर चीज तो ही पै सकती है, अगर उस में से पहली पड़ी हुई चीज कढ के लिए जाए; (इसी प्रकार इस मन को भगवान की तरफ जोड़न के लिए यह जरूरी है कि इस का पहला स्वभाव तबदील किया जाए)। खसम के साथ हुक्म किया हुआ कामयाब नहीं हो सकता, उस के आगे तो निम्रता ही फबदी है। हे नानक ! धोखे का काम करने से धोखा ही होता है, (भावार्थ, जितना समय मनुख दुनिया के धंदिआँ में लगा रहता है, उतना समय चिंता में ही फँसा रहता है, मन) भगवान की सिफ़त-सालाह करने से ही खिलाव में आता है।3।

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