Hukamnama 7 Nov 2026: गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥ गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ ॥ गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ ॥ गुरमुखि निज घरि वासा होइ ॥ गुरमुखि जोगी जुगति पछाणै ॥ गुरमुखि नानक एको जाणै ॥६९॥ बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥ बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई ॥ बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ ॥ बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ ॥ बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि ॥ नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि ॥७०॥ गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि ॥ गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि ॥ गुरमुखि जगु जीता जमकालु मारि बिदारि ॥ गुरमुखि दरगह न आवै हारि ॥ गुरमुखि मेलि मिलाए सुो जाणै ॥ नानक गुरमुखि सबदि पछाणै ॥७१॥ सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥ नामे राते अनदिनु माते नामै ते सुखु होई ॥ नामै ही ते सभु परगटु होवै नामे सोझी पाई ॥ बिनु नावै भेख करहि बहुतेरे सचै आपि खुआई ॥ सतिगुर ते नामु पाईऐ अउधू जोग जुगति ता होई ॥ करि बीचारु मनि देखहु नानक बिनु नावै मुकति न होई ॥७२॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि किआ को आखि वखाणै ॥ तू आपे गुपता आपे परगटु आपे सभि रंग माणै ॥ साधिक सिध गुरू बहु चेले खोजत फिरहि फुरमाणै ॥ मागहि नामु पाइ इह भिखिआ तेरे दरसन कउ कुरबाणै ॥ अबिनासी प्रभि खेलु रचाइआ गुरमुखि सोझी होई ॥ नानक सभि जुग आपे वरतै दूजा अवरु न कोई ॥७३॥१॥
Hukamnama 7 Nov 2026 अर्थ: गुरमुख अर्थात् गुरु की शरण में रहने वाला कोई विरला मनुष्य ही सदा कायम रहने वाले परमात्मा के सच्चे शब्द का चिंतन करता है। गुरु की शरण में आने से मनुष्य के अंदर सच्ची गुरबाणी का प्रकाश हो जाता है। गुरु की कृपा से मन परमात्मा के प्रेम में भीग जाता है, लेकिन इस अवस्था को कोई विरला ही समझता है। गुरमुख मनुष्य अपने वास्तविक घर अर्थात् प्रभु की हजूरी में निवास करता है। वह प्रभु से मिलाप की युक्ति को पहचान लेता है। हे नानक! गुरमुख केवल एक परमात्मा को ही जानता है। ||69|| सतिगुरु की सेवा किए बिना परमात्मा से मिलाप नहीं होता। सतिगुरु से मिले बिना कोई भी मनुष्य मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। सतिगुरु से मिले बिना परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं होता। सतिगुरु से मिले बिना मनुष्य बहुत दुख सहता है। सतिगुरु से मिले बिना मनुष्य अहंकार के घोर अंधकार में रहता है। हे नानक! गुरु के बिना मनुष्य अपना जीवन व्यर्थ गंवा देता है और अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है। ||70|| गुरमुख मनुष्य अहंकार को समाप्त करके अपने मन को जीत लेता है। वह सच्चे परमात्मा को अपने हृदय में बसाता है। गुरमुख संसार पर विजय प्राप्त करता है और मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है। वह प्रभु की दरगाह में कभी हारकर नहीं जाता। जिसे परमात्मा अपने मिलाप में मिला लेता है, वही उसकी महिमा को समझता है। हे नानक! गुरु की शरण से ही मनुष्य परमात्मा के शब्द को पहचानता है। ||71|| हे योगी! गुरु के शब्द का सार सुन, परमात्मा के नाम के बिना योग अर्थात् प्रभु से मिलाप प्राप्त नहीं हो सकता। जो मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं, वे दिन-रात उसके प्रेम में मस्त रहते हैं और नाम के माध्यम से सुख प्राप्त करते हैं। नाम के द्वारा ही सब कुछ प्रकट होता है और सच्ची समझ प्राप्त होती है। नाम के बिना मनुष्य अनेक प्रकार के धार्मिक भेष धारण करते हैं, लेकिन सच्चे प्रभु ने स्वयं ही उन्हें सही मार्ग से भटका दिया है। हे योगी! सतिगुरु से ही परमात्मा का नाम प्राप्त होता है और तभी मनुष्य प्रभु से मिलने का सही मार्ग जान पाता है। हे नानक! अपने मन में विचार करके देख लो कि नाम के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। ||72|| हे प्रभु! तेरी अवस्था और तेरी सीमा को केवल तू ही जानता है। कोई दूसरा तेरे बारे में क्या कह सकता है और क्या वर्णन कर सकता है? तू स्वयं ही छिपा हुआ है और स्वयं ही प्रकट है। तू स्वयं ही सभी आनंदों को भोगता है। अनेक साधक, सिद्ध, गुरु और शिष्य तेरी आज्ञा के अनुसार तुझे खोजते फिरते हैं। वे तुझसे तेरे नाम की याचना करते हैं और तू उन्हें नाम की यह अनमोल दात प्रदान करता है। हे प्रभु! मैं तेरे दर्शन से कुर्बान जाता हूं। अविनाशी प्रभु ने यह संसार रूपी खेल रचाई है और गुरु की शरण में आकर ही मनुष्य इसकी समझ प्राप्त करता है। हे नानक! परमात्मा स्वयं ही सभी युगों में व्याप्त है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है। ||73||1||

