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हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 05 जून 2025

Hukamnama: धनासरी मः ५ ॥ जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥ महा अनंदु सदा करि कीरतनु पुरख बिधाता पाए ॥१॥ अब मोहि राम जसो मनि गाइओ ॥ भइओ प्रगासु सदा सुखु मन महि सतिगुरु पूरा पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥ गुण निधानु रिद भीतरि वसिआ ता दूखु भरम भउ भागा ॥ भई परापति वसतु अगोचर राम नामि रंगु लागा ॥२॥ चिंत अचिंता सोच असोचा सोगु लोभु मोहु थाका ॥ हउमै रोग मिटे किरपा ते जम ते भए बिबाका ॥३॥ गुर की टहल गुरू की सेवा गुर की आगिआ भाणी ॥ कहु नानक जिनि जम ते काढे तिसु गुर कै कुरबाणी ॥४॥४॥ {पन्ना 671}

अर्थ: हे भाई! मुझे पूरा गुरू मिल गया है, (इस वास्ते उसकी कृपा से) अब मैं परमात्मा की सिफत सालाह (अपने) मन में गा रहा हूँ, (मेरे अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है, मेरे मन में सदा आनंद बना रहता है।1। रहाउ।

हे भाई! जब से गुरू के दर्शन प्राप्त हुए हैं, मेरे ऐसे भले दिन आ गए हैं कि परमात्मा की सिफत सालाह कर करके सदा मेरे अंदर सुख बना रहता है, मुझे सर्व-व्यापक करतार मिल गया है।1।

(हे भाई! गुरू की कृपा से जब से) गुणों का खजाना परमात्मा मेरे हृदय में आ बसा है, तब से मेरा दुख-भ्रम-डर दूर हो गया है। परमात्मा के नाम में मेरा प्यार बन गया है, मुझे (वह उक्तम) वस्तु प्राप्त हो गई है जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती।2।

(हे भाई! गुरू के दर्शनों की बरकति से) मैं सारी चिंताओं व सोचों से बच गया हूँ, (मेरे अंदर से) दुख समाप्त हो गया है, लोभ खत्म हो गया है, मोह दूर हो गया है। (गुरू की) कृपा से (मेरे अंदर से) अहंकार आदि रोग मिट गए हैं, मैं यम-राज से भी अब नहीं डरता।3।

हे भाई! अब मुझे गुरू की टहल सेवा, गुरू की रजा ही प्यारी लगती है। हे नानक! कह– हे भाई! मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ, जिसने मुझे यमों से बचा लिया है।4।4।

ੴ वाहेगुरु जी का खालसा
वाहेगुरु जी की फ़तेह जी

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