
सूही महला ५ ॥ तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥ भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥१॥ रहाउ ॥ महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥१॥ सुनि सुनि ही डराइआ ॥ कररो ध्रमराइआ ॥२॥ ग्रिह अंध कूपाइआ ॥ पावकु सगराइआ ॥३॥ गही ओट साधाइआ ॥ नानक हरि धिआइआ ॥ अब मै पूरा पाइआ ॥४॥३॥४६॥
अर्थ: हे प्रभू! मैं तेरी शरण में आया हूँ, इस भरोसे से आया हूँ कि तुम कृपा करोगे। सो, हे मालिक प्रभू! जैसे तुम्हे अच्छा लगे, मेरी रक्षा करो। (मुझे तेरे दर पर) गुरु ने भेजा है, (मुझे तेरे दर का) रास्ता गुरु ने (दिखाया है) ॥१॥ रहाउ ॥ हे प्रभू! (तेरी रची) माया (एक बड़ा समुँद्र है जिस को) पार करना बहुत मुश्किल है। जैसे (तेज़) हवा धक्के मारती है वैसे ही माया (की लहरें धक्के मारती हैं) ॥१॥ हे प्रभू! मैं तो यह सुन सुन कर ही डर रहा हूँ, कि धर्मराज बड़ा सख़्त (हाकम) है ॥२॥ हे प्रभू! यह संसार एक अन्धा खूह है, इस में सारी (तृष्णा की) आग ही आग है ॥३॥ (हे प्रभू! जब से) मैं गुरू का आसरा लिया है, हे नानक जी! (कहो-) मैं परमात्मा का नाम सिमर रहा हूँ, मुझे पूर्ण प्रभू मिल गया है ॥४॥३॥४६॥