
आध्यात्मिक ज्ञान की अनंत निधि वेदों में मनुष्य जीवन को एक यज्ञ की उपमा दी गई है जिस प्रकार भौतिक यज्ञ चार होताओं के द्वारा संचालित किया जाता है उसी प्रकार मनुष्य जीवन रूपी यज्ञ पांच ज्ञानेंद्रियों, मन, बुद्धि एवं आत्मा द्वारा संपन्न होता है। धार्मिक यज्ञ की सामग्री जितनी शुद्ध एवं पवित्र होती है वह उतना ही कल्याणकारी परिणाम देता है ठीक इसी प्रकार हमारे जीवन यज्ञ की सामग्री है स्थूल शरीर में स्थित कर्मेंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां एवं मन, बुद्धि व आत्मा। हमारे जीवन यज्ञ का भरण पोषण करने वाली दर्शन शक्ति पुनीत हो।
श्रवण शक्ति के माध्यम से हम अपने जीवन यज्ञ हेतु उत्तम तत्वों का श्रवण करें। वाणी रूपी शक्ति से मधुरता एवं शालीनता से परिपूर्ण वाणी का प्रयोग करें। मुख से शारीरिक पुष्टता देने वाले आहार का सेवन करें। समस्त ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेंद्रियों से इस जीवन यज्ञ को पावन बनाने का प्रयास निरंतर होना चाहिए। मन से श्रेष्ठ चिंतन मनन, बुद्धि से आध्यात्मिक ज्ञान का संचय हमारे जीवन यज्ञ को आनंद के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि जिस प्रकार उस ईश्वर ने विश्व ब्राह्मण्ड को रचा है उसी विश्वकर्मा ने इस विश्व में हमारा यह छोटा सा जीवन यज्ञ भी सौ वर्ष तक चलने के लिए प्रारंभ किया है। इस जीवन यज्ञ के संचालन हेतु ईश्वर ने मनुष्य को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। उसका मनुष्य जीवन के क्रियाकलापों में किंचित मात्र भी हस्तक्षेप नहीं है अर्थात् ईश्वर ने मनुष्य को अपना जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने इस जीवन यज्ञ को अपने श्रेष्ठ कर्मों की हवि से कितना सुगंधित बनाते है।
ईश्वर ने मनुष्य को विवेक रूपी हीरे से सुसज्जित करके इस जीवन यज्ञ को उत्तमता से संचालन के लिए इस धरा पर भेजा है। हमारे जीवन में जितनी पवित्र एवं सात्विक सामग्री होगी उतना ही जीवन में उल्लास एवं शांति का संचार होगा। इस जीवन रूपीयज्ञ की सामग्री चाहे वह शारीरिक या मानसिक अथवा आत्मिक हो, पूर्ण रूप से उत्कृष्ट होनी चाहिए। हमारी असावधानी अथवा प्रमाद से कहीं इस जीवन में तामिसक या अशुद्धता का समावेश न हो सके इसके लिए सदा ही सचेत रहना चाहिए। थोड़ी सी अशुद्धता या त्रुटि से जिस प्रकार भौतिक यज्ञ भंग हो जाता है उसी प्रकार हमारा जीवन यज्ञ भी आसुरी विचार संपदा से छिन्न-भिन्न हो जाता है जिससे मनुष्य अपने लक्ष्य से वंचित होकर दुखों की वैतरणी में डूब जाता है।
हमें अपने जीवन को यज्ञमय बनाने का प्रयास निरंतर करते रहना चाहिए। जीवन में प्रत्येक कर्म को पवित्रता से पूर्ण करके ईश्वर को समिर्पत करना चाहिए ।त्याग, संयम एवं पूर्ण मनोयोग से ईश्वर प्रदत जीवन रूपी यज्ञ को अध्यात्ममय बनाने का निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए। प्रतिक्षण ईश्वर को साक्षी मानकर उत्तम आध्यात्मिक तत्वों की अनुभूति हेतु समर्पित भाव से कर्म करना चाहिए। इस जीवन यज्ञ में यदि हमारा प्रत्येक कर्म आध्यात्मिकता एवं सत्याचरण से प्रेरित है और यदि प्रत्येक कर्म रूपी आहुति में श्रद्धा एवं सात्विकता का भाव है तो निश्चित रूप से अदृश्य दैवी शक्ति भी निरंतर इस जीवन को संविर्धत करने की प्रेरणा का संचार करती है। वेद में यज्ञ परोपकार, नि:स्वार्थ त्याग, समर्पण का प्रतीक है उसी प्रकार हमारा जीवन भी समर्पण, परोपकार एवं नि:स्वार्थ भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए।
मेष: दिन शुभ रहेगा...