उद्धारपूर्ण भावनाएं शुद्ध, शक्तिशाली भावनाओं को जगाती है। गीता में श्रीकृष्ण, अर्जुन को राजा अंबरीष के माध्यम से सच्चे भक्त के गुण बताते हुए कहते हैं, ‘उन्होंने अपना मन श्रीकृष्ण के चरण कमलों में एकाग्र किया था, वाणी को भगवद धाम का वर्णन करने में लगाया, हाथों को हरिमंदिर की सफाई में व्यस्त किया, कानों को हरिकथा सुनने और नेत्रों को बहगवान के दर्शन में लगाया। तभी वे मत्पर भगवद् भक्त बने।’ अर्थात जब व्यक्ति भगवान के प्रति समर्पित होकर मन, वचन और कर्म से उन्हीं की साधना में लगता है, तभी उसे भक्त पद मिलता है।
परन्तु कई बार उन्हें पाने के लिए भावना और सच्ची प्रार्थना भी सहायक होती है। मथुरा, वृंदावन जैसी जगहों पर आस्था से जुड़ी ऐसी कहानियां मिलती हैं, जिनमें भक्त की एकनिष्ठ लगन भी भगवान को विवश कर देती है। ऐसी ही एक कहानी उस बुढ़िया की है, जो कृष्ण भक्ति में लीन थी। प्रतिदिन यमुना स्नान के लिए जाती थी, लौट कर तुलसी के चौरे पर दीया जलाती थी और साथ ही प्रार्थना करती थी कि जब वह मरे तो कृष्ण जी उसे कांधा दें। एक दिन यही इच्छा लिए वह मर गई। आस-पड़ोस इकट्ठा हो गया। संस्कार के लिए ले जाने की सब तैयारी हो गई, पर शव था कि किसी से उठ ही नहीं रहा था।
जब सब जोर लगा कर हार गए तो उसे कोसने लगे-‘कैसी कमबख्त बुढ़िया थी, किसी के उठाए नहीं उठ रही।’ कुछ समय बीतने पर एक बालक आया, उसका हाथ लगने की देर थी कि शव उठ गया। पर वह बच्चा फिर किसी को नहीं दिखा। वास्तव में यह बुढ़िया का अपने कान्हा पर विश्वास और अधिकार ही था, जिसने उन्हें आने पर विवश कर दिया। इसी भक्ति के बल पर तुलसी ने कृष्ण के हाथ में धनुष- बाण थमा दिया था।
यह भक्ति विवेक-बुद्धि से परे होती है। इसके लिए शास्त्रज्ञान या तपसाधना की जरूरत नहीं होती। एक यहूदी गुरु से किसी ने पूछा कि आजकल लोगों को भगवान क्यों नहीं दिखते? उन्होंने उत्तर दिया, ‘क्योंकि अब कोई इतना झुक कर प्रार्थना नहीं करता।’ ओसवाल्ड चैम्बर्स का मानना है कि ‘आस्था भगवान में विश्वास है, जिसके व्यवहार को हम हर समय समझ नहीं पाते।’ अत: आस्था में ही वह चमत्कार छिपा है, जिसके बल पर शबरी के जूठे बेर राम ने खाए, कृष्ण अर्जुन के सारथी बने।
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