
अष्ट भुजाओं वाली माता श्री द चक्रेश्वरी देवी अपनी दाहिनी चार भुजाओं में वाहन, बाण, चक्र तथा वात्सल्यनमी आशीष तथा बाई भुजाओं में धनुष, वज्र, चक्र व अंकुश धारण किए हुए हैं। दोनों हाथों में चक्र होने के कारण ही माता का नाम श्री चक्रेश्वरी देवी पड़ा। जैन समुदाय में मान्यता है कि जो कोई भी माता के दरबार में सच्चे मन से पुत्र प्राप्ति की कामना करता है, मां उसकी कामना अवश्य पूरी करती है। तभी सरहिन्द में स्थित माता श्री चक्रेश्वरी देवी जैन मंदिर को पुत्र रत्न प्राप्ति के नाम से भी जाना जाता है।
एतिहासिक तथ्यों के अनुसार, महाराजा पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में एक यात्री संघ ‘महम’ वर्तमान रोहतक के पास से चलकर हिसार कोट (हिसार), समियाना (समाना), सींहनद (सरहिन्द) व कोठीपुर होता हुआ कांगड़ा तीर्थ की यात्रा को गया। सरहिन्द में यह संघ तीन दिन रूका व भगवान आदिनाथ की यहां पूजा-भक्ति की। यह यात्री संघ अपने साथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की अधिष्ठायत्री माता चक्रेश्वरी देवी की एक प्रतिमा भी अपने साथ एक बैलगाड़ी में लाए थे।
रात्रि विश्राम कर अगले दिन जब यात्री संघ प्रस्थान करने लगा तो लाख प्रयत्न करने पर भी वह बैलगाड़ी आगे नहीं बढ़ी, जिसमें माता श्री चक्रेश्वरी देवी की प्रतिमा थी। इस पर भक्त-जन बहुत बैचेन हुए। प्रार्थना करने लगे। प्रार्थना करने पर उन्हें आकाश में एक ज्योति-पुंज दिखाई दिया और आकाशवाणी हुई कि यहीं मेरा स्थान है। मैंने यहीं पर निवास करना है। समय पाकर यहीं स्थान महान् जैन तीर्थ बन जाएगा। सभी भक्तजनों ने मां भगवती के आदेश का शिरोधार्य किया।
शीघ्र ही भक्तों ने मिट्टी के छोटे से भवन का निर्माण किया और उसमें माता जी की वह प्रतिमा-पिंडी स्थापित कर दी। इन यात्रियों में अधिकांश खंडेलवाल जैन परिवार ही थे। आज यह स्थान माता श्री चक्रेश्वरी देवी जैन तीर्थ, सरहिन्द के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। तब से लेकर यहां वार्षिक पूजा महोत्सव लगातार तीन दिन तक चलता है। आज भी खंडेलवाल जैन परिवार माता चक्रेश्वरी देवी को अपनी कुल देवी के रूप में पूजते है। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहां दर्शन करने के लिए आते है।
उल्लेखनीय है कि 300 वर्ष पूर्व सरहिंद में गुरु गोबिंद सिंह जी के दो पुत्रों को दीवार में चिनवाने के पश्चात् उनके एवं दादी मां के कुल तीनों पार्थिव शरीरों के अंतिम संस्कार के लिए स्वर्ण मोहरें बिछाकर भूमि प्राप्त करने वाले दीवान टोडर मल जैन का नाम भी सरहिंद की पावन भूमि से जुड़ा हुआ है। माता श्री चक्रेश्वरी देवी के इस उपासक ने नवाब से सोने की मोहरों के बदले भूमि लेकर इन तीनों महान विभूतियों का स्वयं अंतिम संस्कार करवाया। इसी स्थान पर गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरुप बना हुआ है।
इस प्रकार यह महान व पवित्र तीर्थ जैन एवं सिख धर्मानुयायियों की एकता का प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी जगजननी गरुड़ वाहिनी, चक्रधारिणी माता श्री चक्रेश्वरी देवी जी का पूजा महोत्सव 26 से 28 अक्तूबर तक आयोजित हो रहा है। कार्यक्रम अनुसार, 26 अक्तूबर दिन वीरवार त्र्योदशी को श्री भक्ताम्बर महापूजन, माता श्री चक्रेश्वरी देवी महापूजन, माताजी की पालकी की शोभा यात्रा एवं जागरण व आरती होगी, जबकि 27 अक्तूबर चौदस के दिन सामूहिक प्रसाद चढ़ाना, ध्वजारोहण, धर्म सभा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। मुंडन, नामकरण इत्यादि 28 अक्तूबर पूर्णमासी के दिन होंगे।
मेष: दिन शुभ रहेगा...