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सुदामा के तीन मुट्ठी तंदुल

February 26, 2024

सुदामा के तीन मुट्ठी तंदुल

तीन मुट्ठी तंदुल? यह भला कैसा उपहार हुआ सुशीला? माना कि हम दरिद्र हैं पर वे तो नरेश हैं न… नरेश के लिए भला तन्दुल कौन ले जाता है? द्वारिका जाने को तैयार सुदामा ने चावल की पोटली बांधती पत्नी से कहा। उपहार का संबंध प्राप्तकर्त्ता की दशा से अधिक दाता की भावनाओं से होता है प्रभु और एक भिक्षुक ब्राह्मण के घर के तीन मुट्ठी चावल का मूल्य श्रीकृष्ण न समझेंगे तो कौन समझेगा? आप निश्चिन्त हो कर जाइए। सुशीला उस ब्राह्मण कुल की लक्ष्मी थीं, अपने आंचल में परिवार का सम्मान बांध कर चलने वाली देवी। वह अडिग थीं।

सुदामा की झिझक समाप्त नहीं हो रही थी। बोले, ‘किंतु वे नरेश हैं सुशीला। हमें उनकी पद-प्रतिष्ठा का ध्यान तो रखना ही होगा न। तुम यह सब छोड़ दो, मैं यूं ही चला जाऊंगा।‘‘मित्र को स्मरण करते समय यदि उसकी सामर्थ्य पर ध्यान जाने लगे, तो मित्रता प्रदूषित हो जाती है देवता। भूल जाइए कि वे द्वारिकाधीश हैं, बस इतना स्मरण रखिए कि वे आपके वे मित्र हैं जिनके साथ आपने गुरुकुल के दिनों में भिक्षाटन किया था।’ ‘कैसी बातें करती हो देवी। वे बचपन के दिन थे। अब समय ने सबकुछ बदल दिया है।

तबका माखन चोर अब विश्व का सर्वश्रेष्ठ योद्धा है। वे धर्मसंस्थापक है, इस युग के देवता हैं…‘ सुदामा का पुरुष-मन सांसारिक भेदों से मुक्त नहीं हो पा रहा था। ‘समय सामान्य मनुष्यों को बदलता है, कृष्ण जैसे महानायकों को नहीं। वे एक शरीर के अंदर अनेक रूपों में विद्यमान हैं। वे जिससे जिस रूप में मिले, उसके लिए सदैव उसी रूप में रह गए। क्या राधिका मानेंगी कि उनका मुरली-मनोहर अब प्रेमी नहीं, योद्धा हो गया है? क्या नन्द बाबा मानेंगे कि उनका नटखट कन्हैया आज समस्त संसार का पिता हो गया है?

नहीं, वे ब्रज की गोपियों के लिए अब भी माखन चोर हैं, नन्द-यशोदा के लिए अब भी नटखट बालक हैं, राधिका के लिए अब भी प्रिय सखा हैं। वे अर्जुन के लिए जो हैं, वह द्रौपदी के लिए नहीं हैं। वे गोकुल के लिए दूसरे कृष्ण हैं, द्वारिका के लिए दूसरे… हस्तिनापुर के लिए उनका रूप कुछ और है और मगध के लिए कुछ और। आप जा कर देखिए तो, वे आपको अब भी गुरुकुल वाले कन्हैया ही दिखेंगे। यही उनकी विराटता है, यही उनका सौंदर्य…‘ सुशीला ऐसे बोल रही थीं, जैसे कृष्ण सुदामा के नहीं, उनके सखा हों। सुदामा मुस्कुरा उठे।

बोले-‘इतना कहां से देख लेती हो देवी?‘ सुशीला ने हंस कर उत्तर दिया, ‘पुरुष अपनी आंखों से संसार को देखता है, और स्त्री मन से… धोखा तो दोनों ही खाते हैं पर कभी बदलते नहीं।‘ सुदामा ने पोटली उठाई, ईश्वर को प्रणाम किया और निकल पड़े… वे नहीं जानते थे कि द्वारिका में बैठा उनका कन्हैया आंखों में अश्रु लिए उनकी ही प्रतीक्षा कर रहा था।

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