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फसलां दी मुक गई राखी जट्टा आई बैसाखी

उत्सव हमारे मन में सरलता, अतिथिसेवा, परोपकार, दया भाव की भावनाएं उत्पन्न करते हैं इसीलिए उत्सव को जीवन जाति का प्राण कहा जाता है। इनसे जहां जीवन की नीरसता दूर होती है वहीं भारतीय धर्मसंस्कृति एवं महापुरुषों के प्रति आस्था बढ़ती है। बैसाखी पर्व भी ऐसा प्रमुख पर्व है जिसका भारतीय संस्कृति से गहरा नाता है। बैसाखी चाहे पूरे उत्तरी भारत में धूमधाम से मनाया जाता है परन्तु पंजाब की बैसाखी की बात ही निराली होती है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण
बैसाखी पर्व के दिन सूर्य बारह राशियों का चक्र पूरा करके इस दिन पुन: मेष राशि में आता है। यह इस बात का प्रतीक है कि वर्ष बीत गया है। इस दिन यह कामना की जाती है कि आने वाला वर्ष मंगलमय हो। इस दिन को नववर्ष का पहला दिन आंका जाता है। हिन्दू धर्म के अनुयायी नवग्रह पूजन करते हैं और पावन ग्रन्थों का पाठ भी इस अवसर पर किया जाता है। अधिकांश लोग इस दिन तीर्थस्थलों पर जाकर स्नान करते हैं। यदि ऐसा संभव न हो सके तो गंगा जल डालकर स्नान किया जाता है। बैसाखी पर्व ज्योतिष गणना के मुताबिक शुभ दिन आंका गया है, इस दिन नए कार्य भी प्रारंभ किए जाते हैं

देश भक्ति का प्रतीक
वर्ष 1919 की खूनी बैसाखी के दिन अनेक माताओं की गोद सुनी हुई, अनेक सुहागिनों के सुहाग उजड़ गए। अनेक बहनों, बेटियों के भाई और पिता सदा के लिए खामोश हो गए। जलियांवाला बाग अमृतसर में विशाल जनसमूह रोलट एक्ट का विरोध करने के लिए एकत्रित हुआ और जब लोग अपने नेताओं के विचार सुन रहे थे तभी जनरल डायर ने निहत्थे लोगों को अपने कायर सैनिकों की सहायता से गोलियों से भून डाला। कई लोग जान बचाने की भाग-दौड़ में कुएं में गिर गए। दो हजार के करीब शहीद हुए लोगों का श्रद्धांजलि दिवस भी बैसाखी पर्व है। शीत ऋतु का अंत और ग्रीष्म ऋतु के प्रारम्भ से पूर्व वृक्षों के नए पत्ते आने से उनमें नवसंचार होता है और शरीर में भी स्फूर्ति आ जाती है। किसान परिवारों के अरमान भी इस दिवस पर अपने चरम पर होते हैं। खेतों में लहलहाती फसल देख किसान का सीना भी गर्व से चौड़ा हो जाता है और उसे उसकी मेहनत का फल मिलने की आशा बंध जाती है। गेहूं की फसल की कटाई के श्रीगणेश का पारम्परिक दिन भी बैसाखी पर्व ही है।

बैसाखी और मेला
बैसाखी के अवसर पर विशेषकर पंजाब में मेले लगते हैं। मेले का भाव मेल है। सभी लोग आपस में प्रेमभाव से मिलते हैं। जालंधर के करतारपुर में बैसाखी का मेला प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त लोग मंदिरों, गुरुद्वारों में जाकर नववर्ष के मंगलमय होने की कामना भी करते हैं।

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