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यह दुनिया आपके आनंद के लिए है लेकिन उसका आनंद लेते हुए अपने आत्म-स्वरूप को नहीं भूलना है: गुरु देव श्री श्री रविशंकर

आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के अध्यक्ष गुरूदेव श्री श्री रवि शंकर के एक संदेश को जम्मू के साधकों को संस्था की जम्मू-कश्मीर इकाई के संयोजक अजय कपूर ने सुनाया है और कहा है कि श्री श्री रवि शंकर कहते हैं कि जीवन में मिलने वाले प्रत्येक सुख को यदि हम गौर से देखेंगे तो यह पायेंगे कि उनके साथ किसी न किसी कर को भी चुकाना पड़ता है। यह कर दु:ख है, चाहे घटना कितनी भी सुखद लगे, उसके अंत में दर्द मिलता है, जितना अधिक सुख होगा, उतनी ही तीव्रता से दु:ख भी होगा।

किसी चीज को पाने की चाह से पहले, उस चाह से जुड़ा ज्वर कष्टदायक है, जब वह आपको प्राप्त हो जाता है तो उसे खोने का डर कष्टदायक है, जब वह खो जाता है, तो बीते हुए सुनहरे पलों की यादें कष्टदायक होती है। इस रचना में ऐसा कुछ भी नहीं है जो दर्द से विहीन हो। साधना करने में व्यक्ति को अभ्यास करना पड़ता है और वह कष्टदायी है, उसको नहीं करने पर और भी ज्यादा कष्ट मिलता है। दर्द और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, प्रेम के कारण भीषण दर्द होता है और बिछड़ने का भी उतना ही दर्द है। किसी को खुश करने का प्रयास दर्द देता है। इस दर्द को समाप्त कैसे करें, तीन चीजें है : आत्मा, दृष्टा और दर्शन।

अल्पदृष्टि से दर्द होता है, हम अपने जीवन को कहीं और रखते हैं, अपने भीतर नहीं, कुछ लोगों के लिए उनका जीवन उनके बैंक खाते में है। यदि बैंक बंद हो जाये तो उस व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ जाएगा। आप जिसको भी जीवन में अधिक महत्व देते हैं, वहीं दर्द का कारण बन जाता है। ध्यान के माध्यम से, आप अनुभव कर सकते है कि आप शरीर नहीं है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आपको दुनिया से भागना है। यह दुनिया आपके आनंद के लिए है, लेकिन उसका आनंद लेते हुए अपने आत्मस्वरूप को नहीं भूलना है।

पांच ज्ञान इन्द्रियां और पांच कर्म इन्द्रियां, यह पूरी सृष्टि आपको आनन्द और विश्रम देने के लिये है जिससे भी तुम्हें आनन्द मिलता है उसी से ही आपको राहत भी मिलनी चाहिए, वर्ना वहीं आनन्द दर्द बन जाता है। जो ज्ञान में जाग गया है उसके लिये दुनिया बिल्कुल अलग है। उसके लिए कोई पीड़ा नहीं है, उसके लिए इस सृष्टि का हर कण आनंद से या आत्मा के अंश से ही भरा हुआ है। दर्द को जड़ से खत्म करने के लिये यह तत्व ज्ञान जरूरी है- पूरा ब्रह्मांड तरल है, शरीर, मन और यह सारी दुनिया निरंतर परिवर्तित हो रहे हैं। तत्व ज्ञान यह है कि, मैं शरीर नहीं हूं, मैं आत्मा हूं, मैं आकाश हूं, मैं अविनाशी, मैं अपने आस पास की दुनिया से बेदाग हूं। यही तत्व ज्ञान इस चक्र से हमें बाहर निकाल सकता है।

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