
Hukamnama: सूही महला ५ ॥ धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥ सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ ॥ सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥ गरबि गहेली महलु न पावै ॥ फिरि पछुतावै जब रैणि बिहावै ॥ करमहीणि मनमुखि दुखु पावै ॥३॥ बिनउ करी जे जाणा दूरि ॥ प्रभु अबिनासी रहिआ भरपूरि ॥ जनु नानकु गावै देखि हदूरि ॥४॥३॥
अर्थ: हे सखिए! परमात्मा को मिलने की निशानी (मुझसे) सुन ले। (वह निशानी वह तरीका ये है कि) लोक-लाज की खातिर काम करने छोड़ के अपना मन अपना शरीर परमात्मा के हवाले कर दे।1। रहाउ।हे सखिए! वह जीव-स्त्री सराहनीय है, सोहाग भाग वाली है, जो प्रभू-पति के साथ सांझ बनाती है, जो अहंकार छोड़ के प्रभू-पति का हुकम मानती रहती है। वह जीव-स्त्री प्रभू पति (के प्यार-रंग) में रंगी हुई उसके मिलाप का आत्मिक आनन्द लेती रहती है।1।(एक सत्संगी) सहेली (दूसरी सत्संगी) सहेली को (प्रभू-पति के मिलाप के तरीके के बारे में) समझाती है (और कहती है कि) जो जीव-स्त्री वही कुछ करती है जो प्रभू-पति को पसंद आ जाता है, वह सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री उस प्रभू के चरणों में लीन रहती है।2।(पर) जो जीव-स्त्री अहंकार में फसी रहती है, वह प्रभू-पति के चरणों में जगह प्राप्त नहीं कर सकती। जब (जिंदगी की) रात बीत जाती है, तब वह पछताती है। अपने मन के पीछे चलने वाली वह दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री सदा दुख पाती रहती है।3।हे भाई! (लोक-लाज की खातिर मैं तब ही परमात्मा के दर पर) अरदास करूँ, अगर मैं उसको कहीं दूर बसता समझूँ। वह नाश-रहित परमात्मा तो हर जगह व्यापक है। दास नानक (तो उसको अपने) अंग-संग (बसता) देख के उसकी सिफत सालाह करता है।4।3।