
Today Hukamnama 6 June 2026: सलोक मः ५ ॥ भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुट्मबै नालि ॥ कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥ प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥ दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥१॥
पद्अर्थ: भीड़हु = भीड़ से, मुसीबत से। मोकलाई = खलासी, निजात, छुट्टी। कीतीअनु = की है उस (प्रभु) ने। कुटंबै नालि = परिवार समेत। सवारिअनु = सवारे हैं उसने। सभालि = याद रख, याद कर। कंठि = गले से। लहुड़े = छोटे, अंजान। पालि = पाल के। नदरि = मेहर की निगाह से। निहाल = देखता है।
Today Hukamnama 6 June 2026 अर्थ: (हे मन!) उस प्रभु को सदा याद कर जो तेरे सारे काम आप सवाँरता है, जो तुझे दुखों से खलासी देता है और तेरे सारे परिवार समेत तेरी रक्षा करता है। माता-पिता की तरह अंजाने बालकों को पाल के प्रभु (जीवों को) गले से लगाता है। हे नानक! जिस मनुष्य की ओर प्रभु मेहर की निगाह से देखता है, उस पर सब जीव दयालु हो जाते हैं।1।
मः ५ ॥ विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥ देहि नामु संतोखीआ उतरै मन की भुख ॥ गुरि वणु तिणु हरिआ कीतिआ नानक किआ मनुख ॥२॥
पद्अर्थ: जि = जो कुछ। दुखा कै सिरि दुख = दुखों के सिर दुख, बहुत सारे भारी दुख। संतोखीआ = मुझे संतोष आ जाए। भुख = तृष्णा। गुरि = गुरु ने। वणु = बन, जंगल। तिणु = तीला, घास का तीला।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे नाम के बिना (तुझसे) कुछ और माँगना भारी दुख सहने के तुल्य है; (हे प्रभु!) मुझे अपना नाम दे ता कि मुझे संतोख आ जाए और मेरे मन की तृष्णा समाप्त हो जाए।
हे नानक! जिस गुरु ने जंगल और (जंगल की सूखी) घास हरि कर दी, मनुष्य को हरा करना उसके लिए कौन सी बड़ी बात है?।2।
पउड़ी ॥ सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥ घड़ी न मुहतु चसा तिसु बिनु ना सरै ॥ अंतरि बाहरि संगि किआ को लुकि करै ॥ जिसु पति रखै आपि सो भवजलु तरै ॥ भगतु गिआनी तपा जिसु किरपा करै ॥ सो पूरा परधानु जिस नो बलु धरै ॥ जिसहि जराए आपि सोई अजरु जरै ॥ तिस ही मिलिआ सचु मंत्रु गुर मनि धरै ॥३॥
पद्अर्थ: मनहु = मन से। मुहतु = 48 मिनटों जितना समय। चसा = पल का तीसवाँ हिस्सा। ना सरै = नहीं निभता। लुकि = छुप के। भवजलु = संसार समुंदर। परधानु = श्रेष्ठ मनुष्य। बलु धरै = आत्मिक ताकत दे। अजरु = मानसिक ताकत की वह अवस्था जिसको बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल है। जरै = जरता है, सहता है, संभालता है। मंत्रु गुर = गुरु का उपदेश। मनि = मन में। पूरा = सफल कमाई वाला। सचु = सदा कायम रहने वाला परमात्मा।
नोट: ‘तिस ही’ में से ‘तिसु’ की ‘स’ की ‘ु’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।
अर्थ: ऐसी दातें देने वाला प्रभु मन से भूलना नहीं चाहिए, (क्योंकि) उसके बिना (उसको भुला के, जिंदगी की) घड़ी दो घड़ियाँ पल आदि (थोड़ा भी समय) आसान नहीं गुजरता। प्रभु जीव के (सदा) अंदर (बसता है,) उसके बाहर (चौगिर्दे भी) मौजूद है, कोई जीव कोई काम उससे लुका-छिपा के नहीं कर सकता।
वही मनुष्य संसार-समुंदर से पार लांघता है (संसार के विकारों से बचता है) जिसकी इज्जत की रक्षा प्रभु स्वयं करता है। वही भक्त है, वही ज्ञानवान है, वही तपस्वी है, जिस पर प्रभु मेहर करता है। जिसको (विकारों का मुकाबला करने के लिए) प्रभु (आत्मिक) ताकत बख्शता है, उसकी कमाई सफल हो जाती है, वह आदर पाता है। (वैसे मानसिक ताकत भी एक ऐसी अवस्था है जिसकी प्राप्ति पर संभलने की बहुत आवश्यक्ता होती है, आम तौर पर मनुष्य रिद्धियों-सिद्धियों की ओर पलट जाता है) इस डाँवाडोल करने वाली अवस्था में वही मनुष्य संभलता है, जिसको प्रभु स्वयं संभलने की सहायता दे।
जो मनुष्य गुरु का उपदेश हृदय में टिकाता है, उसको सदा-स्थिर प्रभु मिलता है।3।
मेष: दिन शुभ रहेगा...