Today’s Hukamnama: जैतसरी महला ५ ॥ जा कउ भए गोविंद सहाई ॥ सूख सहज आनंद सगल सिउ वा कउ बिआधि न काई ॥१॥ रहाउ ॥ दीसहि सभ संगि रहहि अलेपा नह विआपै उन माई ॥ एकै रंगि तत के बेते सतिगुर ते बुधि पाई ॥१॥ दइआ मइआ किरपा ठाकुर की सेई संत सुभाई ॥ तिन कै संगि नानक निसतरीऐ जिन रसि रसि हरि गुन गाई ॥२॥३॥७॥
Today’s Hukamnama अर्थ:- हे भाई ! वह मनुख सभी के साथ (बरतते) दिखते हैं, पर वह (माया से) निरलेप रहते हैं, माया उनके ऊपर अपना जोर नहीं डाल सकती। वह एक परमात्मा के प्रेम में टिके रहते हैं, वह जीवन की असलीयत के जानने वाले बन जाते हैं-यह समझ उन्होंने गुरु से प्राप्त कर ली होती है।1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के लिए परमात्मा मददगार बन जाता है (उन की उम्र) आत्मिक अढ़ोलता के सारे सुखाँ आनंद के साथ (बीतती है) उनको कोई रोग नहीं सताता।1।रहाउ। हे नानक ! वही मनुख प्रेम-भरे हृदय वाले संत बन जाते हैं,जिनके ऊपर स्वामी-भगवान की कृपा दया होती है जो मनुख सदा प्रेम के साथ परमात्मा के गुण गाते रहते हैं, उन की संगत में रह के संसार-सागर से पार निकल जाते हैं।2।3।7।
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