Last Updated: October 22, 2026

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जय महाकाल के जयकारों से गूंजी उज्जैन नगरी… भस्म आरती में बाबा का हुआ अलौकिक दिव्य श्रृंगार

June 2, 2026

जय महाकाल के जयकारों से गूंजी उज्जैन नगरी… भस्म आरती में बाबा का हुआ अलौकिक दिव्य श्रृंगार

उज्जैनः ज्येष्ठ अधिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि पर विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकालेश्वर के दरबार में सुबह भस्म आरती के दौरान देश-विदेश से आए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान महाकाल की विशेष भस्म आरती के अलौकिक दर्शन किए।

आरती में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। मंदिर के कपाट खुलने से पहले, रात से ही भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। रोजाना परंपरा के अनुसार, भस्म आरती के लिए वीरभद्र से आज्ञा लेकर मंगलवार तड़के मंदिर के कपाट खोले गए। इस दौरान परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय महाकाल’ के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा।

 

भक्तों के चेहरों की खुशी और आंखों की श्रद्धा ने पूरे मंदिर परिसर को पूरी तरह शिवमय और भक्तिमय बना दिया। इसके बाद सबसे पहले भगवान महाकाल को जल अर्पित कर स्नान करवाया गया। इसके बाद उन्हें दूध, दही, घी, शक्कर और शहद से बने पंचामृत से बाबा का अभिषेक किया गया।

इस दौरान गर्भगृह में मंत्रोच्चार से वातावरण पूरी तरह शिवमय हो गया। इसके बाबा का विशेष शृंगार किया गया। इसमें बाबा महाकाल का भांग, चंदन, सूखे मेवों और ताजे फूलों से बेहद खूबसूरत और अलौकिक दिव्य शृंगार किया गया। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की गई।

भस्म आरती के दौरान शंख, डमरू और घंटी की गूंज से पूरा वातावरण बेहद दिव्य और आध्यात्मिक हो गया। पूरा मंदिर परिसर घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा। हर ओर भक्ति और आस्था का माहौल था। महाकाल की भस्म आरती नश्वरता का प्रतीक है। यह संदेश देती है कि सब कुछ अंततः राख हो जाता है, जिससे भक्तों को अहंकार त्यागने की प्रेरणा मिलती है।

कहा जाता है कि पहले चिता की भस्म का उपयोग होता था, लेकिन अब परंपरा के अनुसार भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों (उपलों) और पवित्र वृक्षों (शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश और बेर) की लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है। इस दौरान महिलाएं भी शामिल हो सकती हैं लेकिन परंपरा के अनुसार आरती के समय वे घूंघट में रहकर बाबा के दर्शन करती हैं।

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