Last Updated: October 28, 2026

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क्या है कावड़ यात्रा और यह सावन के महीने में ही क्यों होती है…….?

July 15, 2025

क्या है कावड़ यात्रा और यह सावन के महीने में ही क्यों होती है…….?

सावन का महीना शुरू हो गया है और इसके साथ ही शिवभक्तों के जत्थे गंगा का पवित्र जल शिवलिंग पर चढ़ाने निकल पड़े हैं। ये जत्थे जिन्हें हम कावड़िया कहते है। लेकिन क्या आप जानते हैं कावड़ यात्रा का इतिहास क्या है यह क्यों होती है और इस कावड़ यात्रा का इतिहास महाविद्वानी रावण से भी जुड़ा हुआ है।

सावन का महीना शिवभक्ति, मौसम और धार्मिक मान्यताओं का महीना है और कांवड़ यात्रा के लिए भी सबसे उपयुक्त समय है। इस दौरान भगवान शिव को जल अर्पित करने का विशेष महत्व है। सावन के महीने अथवा श्रावण मास में भोलेनाथ के भक्त गंगा तट पर जाते हैं। वहां स्नान करने के बाद कलश में गंगा जल भरते हैं। फिर कांवड़ पर उसे बांध कर और अपने कंधे पर लटका कर अपने-अपने इलाके के शिवालय में लाते हैं और शिवलिंग पर उस पवित्र जल को अर्पित करते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान सात्विक भोजन किया जाता है। इस दौरान आराम करने के लिए कांवड़ को किसी ऊंचे स्थान या पेड़ पर लटका कर रखा जाता है। साथ ही यह पूरी कांवड़ यात्रा नंगे पांव करनी होती है।

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कांवड़ यात्रा का प्रारंभ :-

हिंदू पुराणों में कांवड़ यात्रा का संबंध दूध के सागर के मंथन से है। जब अमृत से पहले विष निकला और दुनिया उसकी गर्मी से जलने लगी, तो शिव ने विष को अपने अंदर ले लिया। लेकिन, इसे अंदर लेने के बाद वे विष की नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित होने लगे। तो इस नकारात्मक ऊर्जा और हलाहल के प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने शिव पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था। सभी देवता शिवजी पर गंगाजी से जल लाकर अर्पित करने लगे। सावन मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ यहीं से हुआ।

 

रावण से जुड़ा कांवड़ यात्रा का रहस्य :-

ऐसा माना जाता है कि लंकापति रावण भगवान शिव का परम भक्त था। जब रावण ने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तब भगवान शिव क्रोधित हो गए। रावण ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गंगाजल से उनका अभिषेक किया। कहा जाता है कि रावण ने ही पहली बार गंगाजल को एक विशेष विधि से कांवड़ में भरकर लाया था। वह जल लाने के लिए उसने कांवड़ का उपयोग किया और उसे अपने कंधे पर रखकर लाया। इसी परंपरा का पालन करते हुए आज भी शिव भक्त कांवड़ को कंधे पर रखकर चलते हैं।

 

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