पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दिति ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नाम के दो पुत्रों को जन्म दिया। वो दोनों दैत्य थे और जन्म लेते ही उन्होंने व्यस्क रूप ले लिया। उनके जन्म लेते ही श्रृष्टि मे अजीब सी हलचल होने लगी। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों बहुत ही शक्तिशाली थे। और उन्होने भगवान ब्रजी की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न करके उनसे वरदान प्राप्त कर लिये थे। ब्रजी से वरदान पाकर वो दोनों निरन्कुश हो गए।
अपनी शक्ति के अभिमान में उन्होंने भगवान और देवताओं का अपमान करना आरम्भ कर दिया। हिरण्याक्ष ने देवलोक पर आक्रमण करके उसे अपने अधीन कर लिया। फिर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया। ऐसा करने से श्रृष्टि में उथल-पुथल मच गयी। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से गुहार लगाई। तब भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण करके पृथ्वी को अपने दांतों पर उठाकर समुद्र से बाहर निकाला और उसे अपनी कक्षा में स्थापित किया। यह देखकर हिरण्याक्ष क्रोध के मारे आग-बबूला हो उठा।
उसने भगवान वराह को युद्ध के लिये ललकारा। वराह अवतार भगवान विष्णु ने उस अहंकारी दैत्य को युद्ध में पराजित करके उसका वध कर दिया। ऐसी मान्यता है कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों दैत्य भाई पूर्वजन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल थे, और एक ऋषि के शाप के कारण ही उन्हें दैत्य योनि मे जन्म लेना पड़ा। इसलिए उनके उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया और उन्हें दानव योनि से मुक्त किया।
