नई दिल्ली: हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सत्यनारायण के नाम से भी जाना जाता है। देशभर में आज भी लाखों श्रद्धालुओं के घरों में सत्यनारायण व्रत और कथा का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि सत्यनारायण की पूजा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है तथा भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु को सत्यनारायण नाम क्यों मिला और यह नाम किसने दिया? इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है।
जब ब्रह्मा जी के मन में आया अहंकार
शिव महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि सृष्टि की रचना उन्होंने की है। जब उन्होंने यह बात भगवान विष्णु से कही तो विष्णु जी ने स्पष्ट किया कि सृष्टि के रचयिता भगवान शिव हैं।
इस पर ब्रह्मा जी ने प्रश्न किया कि जो शिव कैलाश पर ध्यानमग्न रहते हैं, वे सृष्टि कैसे चला सकते हैं? विष्णु जी ने उत्तर दिया कि भगवान शिव कण-कण में व्याप्त हैं, जल, थल और आकाश हर जगह उनका अस्तित्व है।
ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य
ब्रह्मा जी ने इस कथन की परीक्षा लेने के लिए सामने स्थित पर्वत को हिलाने का आग्रह किया। जैसे ही पर्वत को हिलाया गया, वहां से एक ज्योति रूपी स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ। विष्णु जी ने उस दिव्य स्तंभ की स्तुति शुरू कर दी। तभी आकाशवाणी हुई कि वही शिव सृष्टि के मूल कारण हैं। ब्रह्मा जी ने इसे स्वीकार करने से पहले ज्योतिर्लिंग के छोर को देखने की शर्त रख दी।
निर्णय हुआ कि जो इस ज्योति स्तंभ के आरंभ या अंत को खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। विष्णु जी ने वराह अवतार लेकर नीचे की ओर जाना शुरू किया, जबकि ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर ऊपर की ओर गए।
सत्य और असत्य का अंतर
भगवान विष्णु जानते थे कि शिव अनादि और अनंत हैं, इसलिए कुछ दूर जाने के बाद वे लौट आए और उन्होंने विनम्रता से स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिव के चरण नहीं मिले। इसके विपरीत ब्रह्मा जी अपनी जिद पर अड़े रहे। खोज के दौरान उन्हें एक गाय मिली, जिससे उन्होंने झूठी गवाही देने को कहा। प्रलोभन देकर उन्होंने गाय और केतकी के फूल को भी गवाह बना लिया। जब दोनों देवता वापस आए, तो विष्णु जी ने सत्य स्वीकार किया, जबकि ब्रह्मा जी ने झूठ का सहारा लिया।
शिव का निर्णय और विष्णु को मिला ‘सत्यनारायण’ नाम
ब्रह्मा जी का असत्य सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो गए। उन्होंने गाय और केतकी को भी श्राप दिया और ब्रह्मा जी के झूठे शीश को दंडित किया।
वहीं भगवान विष्णु ने सत्य का पालन किया और अपनी हार स्वीकार की। उनकी इसी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने विष्णु जी को ‘सत्यनारायण’ की उपाधि प्रदान की।
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इस प्रकार भगवान विष्णु सत्य के मार्ग पर अडिग रहने वाले नारायण कहलाए और तभी से उन्हें सत्यनारायण के नाम से भी पूजा जाने लगा।
(Disclaimer: यह लेख धार्मिक ग्रंथों, लोक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आस्था और परंपराओं की जानकारी देना है, न कि किसी प्रकार का वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करना।)

