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फिल्मी जुनून से जनसेवा तक: फिल्म उद्योग और समाज के लिए मिसाल बने सरदार सिंह सूरी

Sardar Singh Suri

एंटरटेनमेंट डेस्क : फिल्म निर्माता और समाजसेवी सरदार सिंह सूरी की 7वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाई गई। प्रेम चोपड़ा को फिल्मी दुनिया में ब्रेक देने वाले सूरी साहब को चार बंगला गुरुद्वारा साहिब में हजारों श्रद्धालुओं ने भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर भजन-कीर्तन, अरदास और विशाल लंगर का आयोजन हुआ, जिसमें 7,000 से अधिक लोगों ने भाग लेकर सेवा और श्रद्धा का परिचय दिया।

एक फिल्म, कई सम्मान और अधूरी रह गई चमक

सरदार सिंह सूरी द्वारा निर्मित पंजाबी फिल्म “एह धरती पंजाब दी” न केवल एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई, बल्कि इसने अपने समय में बड़ी पहचान भी बनाई। सत्यजीत पाल के निर्देशन में बनी इस फिल्म में प्रेम चोपड़ा, जबीन जलील ,निम्मी और मदन पुरी जैसे कलाकारों ने अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।

फिल्म के गीतों मेंमोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर जैसे महान गायकों की आवाज़ ने जान डाल दी।

खास बात यह रही कि इस फ़िल्म के लिए मोहम्मद रफ़ी, प्रेम चोपड़ा, जबीन जलील और स्वयं निर्माता सरदार सिंह सूरी को अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, जो उस दौर में इस फिल्म की सफलता और प्रभाव का प्रमाण था।

फिल्म की कहानी हिंदू-सिख एकता और दोस्ती की मिसाल पेश करती है, जिसमें “मेरे देश की धरती सोना उगले” गीत का पंजाबी संस्करण भी शामिल था, जिसे बाद में हिंदी सिनेमा में अपनाया गया। हालांकि फिल्म की अपार सफलता के बावजूद, साझेदारों द्वारा राइट्स अपने नाम करवा लेने के कारण सूरी साहब को आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया – और यहीं से उनके संघर्ष का दूसरा अध्याय शुरू हुआ।

Sardar Singh Suri
Sardar Singh Suri

संघर्ष से सेवा तक का सफर

रावलपिंडी से विस्थापन, अंबाला में नई शुरुआत और फिर मुंबई में टैक्सी ड्राइवर के रूप में जीवन सरदार सिंह सूरी का हर कदम संघर्ष से भरा रहा। 1965 में फिल्म निर्माण का जोखिम उठाने के बाद जब हालात विपरीत हुए, तो उन्होंने दोबारा टैक्सी चलाना शुरू किया।

1967 में उनकी मुलाकात सरदार दिलीप सिंह से हुई, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी। कंस्ट्रक्शन क्षेत्र से होते हुए उनका रुझान अंततः समाज सेवा की ओर मुड़ गया।

गुरुद्वारे से समाज तक – सेवा की अमिट मिसाल

1967 में एक छोटे से 10×10 ढांचे से शुरू हुआ गुरुद्वारा आज सेवा और समर्पण का बड़ा केंद्र बन चुका है।

प्रतिदिन लगभग 2,000 लोगों को लंगर
रविवार को 5,000 से अधिक श्रद्धालु
600 से अधिक गरीब बच्चों के लिए शिक्षा
200-300 छात्रों को निशुल्क पढ़ाई
सभी धर्मों के बच्चों को समान अवसर

कोरोना काल में रोज़ 10,000 से 15,000 लोगों तक भोजन पहुंचाना हो या बाढ़ पीड़ितों की मदद – हर मोर्चे पर यह गुरुद्वारा अग्रणी रहा है।

Sardar Singh Suri

विरासत जो आज भी जिंदा है

2019 में उनके निधन के बाद उनके पुत्र जसपाल सिंह सूरी इस सेवा को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि मनिंदर सिंह सूरी भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।

हर साल उनकी पुण्यतिथि पर होने वाला यह आयोजन अब केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सेवा, एकता और मानवता का प्रतीक बन चुका है।

एक प्रेरणा, जो हमेशा रहेगी

सरदार सिंह सूरी का जीवन इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि सच्चा संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।उन्होंने न केवल फिल्म इंडस्ट्री को नई प्रतिभाएं दीं, बल्कि समाज को सेवा का ऐसा मॉडल दिया, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। उनकी पुण्यतिथि पर उमड़ा जनसैलाब यही कहता है कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनकी सोच और सेवा हमेशा ज़िंदा रहती है।

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