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Movie Review: Happy Patel फिल्म आख़िर कहना क्या चाहती है, साथ में सिर दर्द की गोली रखना बेहतर रहेगा

Happy Patel Movie Review

एंटरटेनमेंट डेस्क (फरीद शेख): दिल्ली बेली, भेजा फ्राय और फास गए ओबामा जैसी फिल्मों ने अपनी हटके कहानियों से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उसी तरह का जादू दिखाने की कोशिश हैप्पी पटेल में भी की गई है, लेकिन अफ़सोस यह जादू पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाता।

आमिर खान प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी हैप्पी पटेल को एक आउट-ऑफ-द-बॉक्स कॉमेडी बनाने की कोशिश ज़रूर नज़र आती है। वीर दास ने अपनी तरफ़ से काफ़ी मेहनत की है, लेकिन कहानी में वह दम नहीं है जो दर्शकों को अंत तक बांधे रख सके। मोना सिंह की एक्टिंग भी कुछ खास असर नहीं छोड़ पाती दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर थोड़े डगमगाते हुए नज़र आते हैं।

फिल्म का पहला हाफ काफ़ी हद तक मनोरंजक है और आपको हंसाता भी है, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी इतनी भटक जाती है कि सिर दर्द होने लगता है। इस दौरान यह समझना मुश्किल हो जाता है कि फिल्म आख़िर कहना क्या चाहती है इसलिए साथ में सिर दर्द की गोली रखना बेहतर रहेगा।

फिल्म में आमिर खान का कैमियो ज़रूर है, लेकिन वह ओवरएक्टिंग से भरा हुआ लगता है और कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाता। कुल मिलाकर, कुछ अच्छे पलों के बावजूद फिल्म ज़्यादातर समय सिर्फ़ “सिर दर्द” बनकर रह जाती है। फिल्म रिव्यू

इमरान ख़ान का इसे कमबैक कहें या सिर्फ़ कैमियो समझ से बाहर है। फिल्म में उनकी मौजूदगी का कहानी पर कोई असर नहीं पड़ता। पूरी फिल्म में पकड़ की कमी है और क्लाइमेक्स देखकर तो सच में इंसान सोच में पड़ जाता है कि आखिर दिखाना क्या चाह रहे थे।

क्लाइमेक्स में मामा यानी मोना सिंह और हैप्पी पटेल के बीच एक कुकिंग कॉम्पिटिशन दिखाया गया है, जिसके जज बने हैं संजीव कपूर। जजमेंट के नाम पर बस एक डायलॉग “नमक स्वाद अनुसार।” इतनी बड़ी फिल्म का अंत अगर ऐसे मज़ाकिया और बेमतलब सीन पर हो, तो दर्शक निराश ही होंगे।

कुल मिलाकर फिल्म बेहद कमजोर है। कहानी, प्रस्तुति और लॉजिक तीनों मोर्चों पर फिल्म फेल होती है। फिल्म के नाम पर दर्शकों को कुछ भी परोस देना सही नहीं है। यह फिल्म समय और पैसे दोनों की बर्बादी साबित होती है।

दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज़ मीडिया नेटवर्क की ओर से हैप्पी पटेल को 1.5 स्टार की रेटिंग दी जाती है।

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