एंटरटेनमेंट डेस्क: राजकुमार राव, जो हमेशा से ही एक व्यवस्थित अभिनेता रहे हैं, तकनीकी रूप से तो अच्छे हैं, लेकिन उनमें वो प्रभाव नहीं है जो ऐसे खलनायकों की भूमिकाओं में ज़्यादा सफल और प्रशिक्षित अभिनेताओं में होता है। उनके वफ़ादार सिपाही के रूप में अंशुमान पुष्कर सबसे ज़्यादा निखरते हैं। सौरभ सचदेवा और प्रसेनजीत चटर्जी शुरुआत में तो चमकते हैं, लेकिन फिर रूढ़िबद्ध किरदारों में सिमट जाते हैं।
राजकुमार का अभिनय बेहद शानदार है। उन्होंने बेजोड़ शालीनता के साथ फिल्म का भार अपने कंधों पर उठाया है। पटकथा कसी हुई है, संवाद धारदार हैं, और निर्देशन आपको पूरी तरह बांधे रखता है। मालिक को ख़ास बनाने वाली बात सिर्फ़ इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि ही नहीं, बल्कि इसमें मौजूद भावनात्मक गहराई भी है। यह कोई आम नायक-खलनायक की कहानी नहीं है यह कर्तव्य और नैतिकता के बीच फँसे व्यक्ति के फ़ैसलों के बारे में है।
कहानी 80 के दशक में इलाहाबाद में सेट है, जहां एक मजबूर किसान राजेंद्र गुप्ता का बेटा दीपक (राजकुमार राव) अपनी किस्मत के आगे झुकने को तैयार नहीं है, बल्कि वह अपने पिता की किस्मत बदलकर उसे एक मजबूत बेटे का बाप बनाने पर आमादा है। उसे यह मौका तब मिल भी जाता है, जब इलाके के बाहुबली नेता शंकर सिंह (सौरभ शुक्ला) का गुर्गा उसके पिता के ऊपर ट्रैक्टर चलवा देता है। दीपक इलाके के बाहुबली शंकर सिंह को आइडल मानता है। बस फिर क्या था, इसके बाद दीपक बीच चौराहे पर उस गुंडे को बेरहमी से खत्म कर अपनी दबंगई साबित कर देता है और बन जाता है- मालिक।
पुलकित के निर्देशन में इरादे की झलक तो दिखती है, लेकिन लहजे और उद्देश्य में स्पष्टता की कमी किसी भी गति को पटरी से उतार देती है जो अपराध और उसके परिणामों का एक आकर्षक चित्रण हो सकता था, वह क्राइम ड्रामा के ढेर में एक और नीरस प्रविष्टि बनकर रह जाता ह जिसे फिल्म के तनाव को और बढ़ाना चाहिए था, निराशाजनक है। दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज मीडिया नेटवर्क इस फिल्म को 3 स्टार रेटिंग देती है
मालिक की कहानी ऐसी लगती है आप दो चार गैंगस्टर फिल्म एक साथ देख रहे हैं राजकुमार राव बहुत अच्छे अभिनेता हैं दर्शकों को उनसे प्यार करती है..क्या दर्शकों को इनका गैंगस्टर वाला रूप पसंद आया…? हर बार की तरह उनकी एक्टिंग आपको निराश नहीं करेगी।
दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज मीडिया नेटवर्क इस फिल्म को 3 स्टार रेटिंग देती है।

