Movie Review(फरीद शेख): ‘गुस्ताख इश्क़’ डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा की बतौर निर्माता पहली फिल्म सादगी में लिपटी एक नरम कहानी पेश करती है। भावनाओं में थोड़ा और साहस दिखाया जाता तो असर और गहरा हो सकता था। हालांकि, कविता, संगीत और कलाकारों के प्रदर्शन में इसकी खूबसूरती बार-बार झलकती रहती है, भले ही कहानी बीच-बीच में फिसलन भरी महसूस होती है। यह फिल्म शोर मचाकर नहीं, हल्की-सी मुस्कुराहट और धीमी ताली के साथ दिल में जगह बना लेती है। खत्म होने पर पूरी कहानी नहीं, उसके कुछ नाज़ुक और यादगार पल ही दिमाग में बस जाते हैं। शायद यही थोड़ी-सी कमी, यही सादगी और नर्म अहसास ‘गुस्ताख इश्क़’ की सबसे खूबसूरत पहचान बनकर रह जाता है।
कहानी नवाबुद्दीन (विजय वर्मा) की है, जो अपने दिवंगत पिता द्वारा छोड़ी गई प्रिंटिंग प्रेस को बचाने के लिए बेताब है। उसकी कोशिश रहती है कि प्रेस की खोई हुई प्रतिष्ठा वापस मिल जाए। इसी दौरान उसे अज़ीज़ बेग के अप्रकाशित काम के बारे में पता चलता है। अज़ीज़ एक प्रतिभाशाली शायर है, जिसने हमेशा शोहरत और दौलत से दूरी बनाए रखी है।
अब उम्र के इस पड़ाव पर, जब उसकी आंखों की रोशनी भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है, अज़ीज़ अपनी बेटी मिन्नी (फातिमा सना शेख) और घर के वफादार मददगार अटैची (शारीब हाशमी) के साथ मलेरकोटला में शांत जीवन जी रहा है। अटैची को अज़ीज़ ने परिवार की तरह ही पाला है।
नवाबुद्दीन शायरी सीखने के बहाने अज़ीज़ से मिलता है। मिन्नी की मदद से वह उन्हें मनाने की कोशिश करता है कि उनकी रचना को प्रकाशित होने दें, लेकिन अज़ीज़ जिद्दी रूप से इनकार करते रहते हैं।
जब नवाबुद्दीन परिवार के कुछ मसलों को सुलझाने दिल्ली चला जाता है और मिन्नी को बिना बताए, तो उनके बीच दूरी आ जाती है। हालात तब और बिगड़ जाते हैं, जब नवाबुद्दीन का भाई प्रेस बेचने का फैसला कर लेता है। ऐसे में नवाबुद्दीन अपने पिता की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए फिर से अज़ीज़ के पास लौटता है।
आजकल ज़्यादातर फ़िल्में तेज़ शोर-शराबे वाले एक्शन और तयशुदा हॉरर-कॉमेडी के फ़ॉर्मूलों पर चलती हैं, ऐसे में ‘गुस्ताख इश्क़’ एक मुलायम-सी राहत की तरह सामने आती है। यह कहानी आपको लोगों, उनकी बातचीत और नन्हीं-नन्हीं भावनाओं पर ध्यान देने का मौक़ा देती है। नवाबुद्दीन और अज़ीज़ की मुलाक़ातों में एक सादगीभरी गर्माहट है, जो फ़िल्म की बुनियाद को मज़बूत बनाती है। अशोक सिंह मिज़ाज़ की लिखी और शाह की आवाज़ में सुनाई गई शायरी फ़िल्म को एक मीठा असर देती है।
शाह और वर्मा की जुगलबंदी में गुरु-शिष्य का संबंध बड़ी सहजता से उभरकर आता है, जिसे देखना अच्छा लगता है। लेकिन ड्रामा और रोमांस के बीच टिकी इस कहानी में दोनों भावनाएँ पूरी तरह निखर नहीं पातीं। इंटरवल पर जिसे बड़ा मोड़ होना चाहिए था, वह बिना कोई गहरी छाप छोड़े निकल जाता है। नवाबुद्दीन और मिन्नी का रिश्ता इतनी कोमलता से आगे बढ़ता है कि कभी-कभी यह मुख्य कथा से अलग-सा लगता है।
इच्छाएं सच्ची हैं, माहौल भी सही है, पर कहानी लिखने में वह तीखे भाव नहीं उतर पाए, जिन्हें छूने की कोशिश हर दृश्य करता है। फ़िल्म देखने के बाद कुछ खूबसूरत पल ज़हन में रह जाते हैं, लेकिन बड़ा असर रह जाता है।
दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज़ मीडिया नेटवर्क ने इस फिल्म को 3.5 की रेटिंग दी है।
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