फ्रांस: भारतीय सिनेमा की नई लहर और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की मिसाल बनकर उभरी सुदीप्तो सेन की नई फिल्म ‘चरक’ ने कान्स फिल्म फेस्टिवल 2025 में धमाकेदार दस्तक दी है। लोककथाओं से प्रेरित हॉरर मिस्ट्री थ्रिलर चरक ने जहां दर्शकों को रोमांचित किया, वहीं समीक्षकों से भी इसे ज़बरदस्त सराहना मिली।
चरक को कान्स में एक विशेष स्क्रीनिंग के तहत दिखाया गया, और खचाखच भरे ऑडिटोरियम में जैसे ही फिल्म शुरू हुई, एक अलग ही ऊर्जा देखने को मिली। फिल्म के प्रदर्शन के बाद तालियों की गूंज और खड़े होकर किया गया अभिवादन इस बात का प्रमाण था कि भारतीय माइथोलॉजिकल थ्रिलर अब विश्व मंच पर भी अपनी जगह बना चुकी है।
इस फिल्म के साथ सुदीप्तो सेन ने बतौर निर्माता अपना डेब्यू किया है। “द केरल स्टोरी” जैसी सामाजिक रूप से चर्चित फिल्म देने वाले सेन ने इस बार सिपिंग टी सिनेमा बैनर के तहत निर्माता की नई भूमिका निभाई है, जबकि फिल्म का निर्देशन शीलादित्य मौलिक ने किया है और स्क्रिप्ट संजय हलदर ने लिखी है।
चरक की थीम: परंपरा और अंधविश्वास के टकराव की कहानी
चरक एक बेहद गूढ़ विषय पर आधारित है — बंगाल, बिहार और ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित चरक पूजा, जो लोक आस्था और भक्ति के साथ-साथ कभी-कभी अंधभक्ति की सीमाएं भी लांघ जाती है। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे सांस्कृतिक परंपराओं का अंधा अनुसरण इंसानियत को खतरे में डाल सकता है। यह कहानी धर्म, भय और परंपरा के बीच झूलते समाज की एक गहराई से पड़ताल करती है।
कई अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों ने फिल्म की तुलना “कंतारा” जैसी जड़ों से जुड़ी सिनेमाई रचनाओं से की, और कहा कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा में एक नई धारा की शुरुआत है, जहां लोककथाएं सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की वाहक बन रही हैं।
सुदीप्तो सेन का बयान: भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकृति
कान्स में मिले जबरदस्त रिस्पॉन्स पर प्रतिक्रिया देते हुए सेन ने कहा, “चरक केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर सराहना मिलना हमारे लिए गर्व की बात है। यह दर्शाता है कि हमारी लोककथाओं और परंपराओं में इतनी शक्ति है कि वे दुनिया भर के दर्शकों को छू सकती हैं।”
‘चरक’ की वैश्विक यात्रा और भारतीय सिनेमा का बढ़ता प्रभाव
बर्लिन फिल्म फेस्टिवल 2025 में मिल चुकी पहले की तारीफों के बाद अब कान्स में भी चरक की सफलता भारतीय फिल्मों की वैश्विक स्वीकार्यता को और मजबूत करती है। यह फिल्म दर्शाती है कि यदि कहानियां जड़ों से जुड़ी हों, सशक्त हों और प्रामाणिक हों, तो वे सीमाओं के पार भी लोगों को प्रभावित कर सकती हैं।

