नेशनल डेस्क : भारत का लोकतांत्रिक ढांचा इस सिद्धांत पर टिका है कि केवल भारतीय नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार है। इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) में जो नाम शामिल हैं, वे भारतीय नागरिकों के ही हों। चुनाव आयोग का काम सिर्फ मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करना है, ताकि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी रहें। इसी सिलसिले में हाल ही में बिहार समेत अन्य राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसी बीच आज हम यह जानेंगे की भारत में नागरिकता देने का अधिकार किसे है। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…
कौन करता है नागरिकता की पुष्टि
भारत में नागरिकता की पुष्टि करने या नागरिकता देने का मूल अधिकार केंद्र सरकार, विशेषकर गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के पास होता है। गृह मंत्रालय ही यह तय करता है कि कौन व्यक्ति भारत का नागरिक है और कौन नहीं। यह काम नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955) के तहत किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर विवाद हो तो उसे गृह मंत्रालय के माध्यम से ही हल किया जाता है।
भारत में क्या है चुनाव आयोग की भूमिका
चुनाव आयोग (Election Commission of India) नागरिकता नहीं देता, न ही वह किसी को नागरिक घोषित करता है। लेकिन इसका दायित्व यह है कि वोटर लिस्ट में केवल वही लोग हों जो भारतीय नागरिक हो। इसीलिए चुनाव आयोग वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन के दौरान कुछ जरूरी दस्तावेज मांग सकता है, जिससे यह पुष्टि हो सके कि व्यक्ति भारतीय नागरिक है। चुनाव आयोग की इस भूमिका को नागरिकता की “जांच” नहीं, बल्कि “सत्यापन” माना जाता है यानी यह देखा जाता है कि क्या वोटर लिस्ट में कोई अयोग्य या अवैध नाम तो नहीं जुड़ गया है।
Aadhar card को नहीं माना जाता पर्याप्त प्रमाण
भले ही आधार कार्ड व्यापक पहचान दस्तावेज है, लेकिन यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है। आधार कार्ड भारतीय नागरिकों के साथ-साथ भारत में रहने वाले विदेशी नागरिकों, प्रवासियों और शरणार्थियों को भी जारी किया गया है। इसलिए, सिर्फ आधार कार्ड के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है।
नागरिकता देने का अधिकार किसके पास है ?
भारत में नागरिकता देने या जांचने का पूर्ण अधिकार केंद्र सरकार यानी भारत सरकार के पास होता है। यह जिम्मेदारी गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के अंतर्गत आती है। न तो राज्य सरकार और न ही कोई स्थानीय एजेंसी किसी को भारतीय नागरिक घोषित कर सकती है या उसकी नागरिकता रद्द कर सकती है। भारत में नागरिकता देने का कानूनी आधार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 11 और नागरिकता अधिनियम 1955 में दिया गया है।इस कानून के तहत नागरिकता पांच तरीकों से दी जा सकती है।
5 तरीकों से दी जाती है नागरिकता
-जन्म से नागरिकता – यदि कोई व्यक्ति भारत में जन्म लेता है और उसके माता-पिता भारतीय नागरिक हैं (विशिष्ट शर्तों के तहत), तो उसे भारतीय नागरिकता मिल सकती है।
-वंशानुक्रम से नागरिकता (By Descent) – अगर माता-पिता भारत के नागरिक हैं, लेकिन बच्चा विदेश में जन्मा है, तो वह भारत की नागरिकता का पात्र हो सकता है।
-पंजीकरण द्वारा (By Registration) – कुछ मामलों में, व्यक्ति भारत सरकार के पास आवेदन देकर पंजीकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त कर सकता है।
-देशीयकरण द्वारा (By Naturalization) – यदि कोई विदेशी व्यक्ति भारत में कई वर्षों तक रह चुका है और तय मानकों को पूरा करता है, तो उसे नागरिकता दी जा सकती है।
-भारतीय क्षेत्र के विलय के द्वारा (By Incorporation of Territory) – यदि कोई क्षेत्र भारत में शामिल होता है, तो वहां के निवासी स्वत: नागरिक बन सकते हैं।
इन सभी मामलों में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार के अधीन गृह मंत्रालय द्वारा लिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट और संविधान की भूमिका
भारत के संविधान का अनुच्छेद 5 से 11 नागरिकता से संबंधित है। अनुच्छेद 326 कहता है कि केवल भारतीय नागरिक ही मतदान कर सकते हैं। यदि नागरिकता से संबंधित कोई विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचता है, तो वह सिर्फ यह सुनिश्चित करता है कि सरकारें संविधान के अनुसार काम कर रही हैं या नहीं। परंतु किसी को नागरिकता देना या रद्द करना फिर भी गृह मंत्रालय का अधिकार ही रहेगा।
भारत में नागरिकता देने, छीनने या जाँचने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है। चुनाव आयोग या राज्य सरकारें केवल सत्यापन कर सकती हैं, लेकिन किसी को नागरिक मानना या न मानना गृह मंत्रालय का काम है। अगर नागरिकता को लेकर कोई कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई होनी है, तो उसका अंतिम निर्णय केंद्र सरकार ही करती है।

