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“120 बहादुर”— इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली हिंदी फिल्म

December 16, 2025

“120 बहादुर”— इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली हिंदी फिल्म

आजकल भारत में एक हिंदी फिल्म“120 बहादुर”का प्रदर्शन जा रहा है। इस फिल्म का दावा है कि वह एक अविश्वसनीय सच्ची कहानी पर आधारित है ,लेकिन इतिहास के तथ्यों से साबित हुआ कि यह मनमाने ढंग से बनाया गया एक झूठा किस्सा है,जिसने काले को सफेद बताया और दर्शकों को गंभीर रूप से भ्रमित किया।

“120 बहादुर”कहानी की पृष्ठभूमि वर्ष 1962 चीन-भारत सीमा युद्ध है ।इस फिल्म के निर्माता ने वस्तुगत और निष्पक्ष तौर पर उस युद्ध को नहीं देखा और गहराई से अध्ययन भी नहीं किया ।उन्होंने इस युद्ध में लिप्त आक्रमणकारी और आत्मसंरक्षक पूरी तरह पलट दिया है और न्याय तथा अन्याय के स्वरूप को उलझा दिया।

चीन और भारत की सीमा का औपचारिक निर्धारण इतिहास में कभी भी नहीं किया गया ।लंबे इतिहास में सिर्फ एक परंपरागत रेखा मौजूद है ।चीन-भारत सीमा के पूर्वी सेक्टर में तथाकथित मैकमोहन लाइन और पश्चिमी सेक्टर में कथित जोसन लाइन ब्रिटिश उपनिवेशकों द्वारा बनायी गयी है ।किसी भी चीन सरकार ने उन दोनों को स्वीकार नहीं किया ।नये चीन की स्थापना के बाद चीनी पक्ष ने कई बार शांति वार्ता से चीन-भारत सीमा सवाल का समाधान करने की अपील की ,लेकिन तत्कालीन भारत सरकार ने इनकार किया और उपनिवेशकों द्वारा खींची गयी सीमा लाइन को मजबूरी से चीन पर थोपने की कोशिश की ।उसने फार्वर्ड पॉलिसी लागू कर धीरे-धीरे चीनी भूमि को कब्जा करना जारी रखा।

ध्यान रहे अप्रैल 1962 से भारतीय सेना ने सीमा के पश्चिमी सेक्टर की चीनी भूमि में 43 सैन्य ठिकाने स्थापित किये, जिस में “120 बहादुर”में चर्चित रेजांग ला शामिल हैं ।चीन सरकार और चीनी सीमा बल ने भारतीय सेना के अतिक्रमण और चुनौती के प्रति सर्वोच्च संयम रखा और सैन्य मुठभेड़ से बचने के लिए सिलसिलेवार कदम उठाये। लेकिन तत्कालीन भारत सरकार ने चीनी पक्ष को कायर समझकर अतिक्रमणकारी गतिविधि तेज की और निरंतर सशस्त्र मुठभेड़ छेड़ी। ऐसी स्थिति के सामने चीन ने आत्म संरक्षण लड़ाई शुरू की और अंत में विजय पायी। उल्लेखनीय बात है कि निर्णायक जीत हासिल करने के बाद चीनी पक्ष ने युद्ध विराम की घोषणा की और बरामद हथियारों तथा बंधकों को भारतीय पक्ष को लौटा दिया।इस से जाहिर है कि चीन को वार्ता से सीमा सवाल सुलझाने की सदिच्छा है। “120 बहादुर” में वर्णित भारतीय जवान वास्तव में तत्कालीन सरकार के फार्वर्ड पॉलिसी के शिकार हैं, बहादुर नहीं। बहादुर हमेशा न्यायपूर्ण कार्य के लिए लड़ाई लड़ते हैं।

“120 बहादुर”में जिस लड़ाई की कहानी सुनायी गयी है,वह भी ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। इस फिल्म का दावा है कि भारतीय जवानों ने रेजांग ला में 5000 चीनी सैनिकों का हमला रोका और 1300 चीनी जवान मारे। संबंधित सामग्री के अनुसार इस लड़ाई में चीनी सैनिकों ने सिर्फ 1 घंटे 40 मिनट में रेजांग ला पर गैरकानूनी रूप से स्थापित भारतीय सेना का गढ़ ध्वस्त किया। सिर्फ 21 चीनी जवान शहीद हुए।

इस साल चीन भारत राजनयिक संबंध की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ है। 75 वर्षों में चीन भारत संबंध तूफान से गुजरे थे ,लेकिन मैत्रीपूर्ण सहयोग हमेशा मुख्य धारा है ।पिछले साल दोनों देशों की कजान भेंटवार्ता के बाद द्विपक्षीय संबंधों में लगातार सुधार हो रहा है ,यह रूझान अनिवार्य। इस साल चीन ने फिर भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए शीत्सांग स्थित कैलाश और मानसरोवर खोला है ,भारतीय पक्ष ने चीनी नागरिकों को वीजा जारी करना बहाल किया ,दोनों देशों के बीच सीधी उड़ान भी बहाल हुई है। उन कदमों को दोनो देशों की जनता का जोशपूर्ण स्वागत मिला।

खास बात है कि एससीओ थ्येनचिन शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के नेताओं ने फिर वार्ता की और द्विपक्षीय संबंधों के भावी विकास के लिए दिशा दिखायी है। अब दोनों पक्ष सक्रियता से दोनों देशों के नेताओं के बीच संपन्न समानताएं लागू कर रहे हैं। ऐसे माहौल में “120 बहादुर”को रिलीज करना प्रतिकूल धारा है। वह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर संकीर्ण राष्ट्रवाद उकसाती है, दोनों देशों की जन-इच्छा का मुकाबला छेड़ती है और चीन भारत संबंधों पर गलत प्रभाव डालती है। दोनों देशों के दूरदर्शी लोगों को इसके प्रति सतर्क रहना चाहिए।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)

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