इंटरनेशनल डेस्क : बांडुंग सम्मेलन, पहला एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन, 18 अप्रैल 1955 को बांडुंग, इंडोनेशिया में आयोजित किया गया था, जिसकी 2025 में 70वीं वर्षगांठ है। इस सम्मेलन में एशियाई और अफ्रीकी देशों के बीच एकजुटता पर ध्यान केंद्रित किया गया, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरोध पर जोर दिया गया, बहुपक्षवाद के माध्यम से संप्रभुता, स्वतंत्रता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया गया । सम्मेलन ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों की आधारशिला भी रखी, जो अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और कानून में प्रभावशाली बन गए हैं।
यह सम्मेलन एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्र राष्ट्रों के लिए उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की विरासत के खिलाफ एकजुट होने का एक महत्वपूर्ण क्षण था।सम्मेलन में राष्ट्रीय संप्रभुता और राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के अधिकार के महत्व पर जोर दिया गया। सम्मेलन ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को एकतरफा कार्रवाई या गठबंधन के बजाय राष्ट्रों के बीच बातचीत और सहयोग के माध्यम से हल करने के विचार को बढ़ावा दिया। सम्मेलन में एशियाई और अफ्रीकी देशों के बीच “एकता, मैत्री और सहयोग” की भावना व्यक्त की गई तथा साझा पहचान और उद्देश्य की भावना को बढ़ावा दिया गया।
चीन द्वारा प्रस्तावित *पंचशील सिद्धांत* (शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पांच सिद्धांत) बांडुंग भावना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया, जिसे दुनिया के अधिकांश देशों ने स्वीकार किया और यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का मूल आधार बन गया। चीन द्वारा प्रस्तावित ये सिद्धांत बांडुंग स्पिरिट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए और इन्हें अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मौलिक मानदंडों के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।
इस सम्मेलन में “एकता, मित्रता और सहयोग” के मूल भाव को केंद्र में रखते हुए “बांडुंग आत्मा” (Bandung Spirit) का जन्म हुआ। चीन द्वारा प्रस्तावित “सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत” — एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, एक-दूसरे पर आक्रमण न करना, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और पारस्परिक लाभ, और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व — को इस सम्मेलन में व्यापक रूप से स्वीकार किया गया और ये आज भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और अंतर्राष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांत माने जाते हैं।
पिछले 70 वर्षों में एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्र के साथ-साथ विकासशील देशों की वैश्विक मंच पर भूमिका लगातार बढ़ी है। बांडुंग सम्मेलन न केवल एक ऐतिहासिक मोड़ था, बल्कि एक प्रेरणा बनकर उभरा जिसने वैश्विक दक्षिण के देशों को एक साझा मंच प्रदान किया और सहयोग, समानता तथा स्वतंत्रता के आदर्शों को नई दिशा दी।
बांडुंग सम्मेलन की 70वीं वर्षगांठ पर, दुनिया आज फिर से “बांडुंग आत्मा” की प्रासंगिकता को महसूस कर रही है — एक ऐसा दृष्टिकोण जो शांति, सहयोग और समानता की भावना को आगे बढ़ाता है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)

