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अमेरिका और ईरान के बीच समझौता, दोनों देशों ने MoU पर किए हस्ताक्षर

US-Iran deal

US-Iran deal

इंटरनेशनल डेस्क: लंबे समय से जारी तनाव और कई दौर की बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हो गया है। दोनों देशों ने एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके बाद दोनों देशों के संबंधों में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने 17 जून को इस समझौते को औपचारिक मंजूरी दी। हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू हो गया।

जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने फ्रांस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान समझौते की हार्ड कॉपी पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद समझौते से जुड़े दस्तावेज संबंधित पक्षों और मध्यस्थ देशों को भी भेज दिए गए। इससे पहले दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी समझौते को मंजूरी दी थी। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इस कदम से पिछले कई महीनों से जारी तनाव को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।

 

जिनेवा में प्रस्तावित बैठक बरकरार

समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद अमेरिका और ईरान के अधिकारियों की जिनेवा में प्रस्तावित बैठक फिलहाल तय कार्यक्रम के अनुसार रखी गई है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि इस बैठक का उद्देश्य नए समझौते पर हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि पहले से हुए समझौते के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना है। हालांकि बैठक निर्धारित समय पर होगी या नहीं, इस संबंध में अंतिम निर्णय जल्द लिया जा सकता है।

तेल निर्यात और आर्थिक प्रतिबंधों पर ईरान का रुख

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि उनके देश को अपने तेल का निर्यात बिना किसी अतिरिक्त बाधा के करने की अनुमति मिलनी चाहिए। तेल बिक्री से होने वाली आय तक ईरान की पूर्ण पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। अमेरिका ने ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों तक पहुंच से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए सहयोग का आश्वासन दिया है। इसे दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

अगले 60 दिन रहेंगे अहम

समझौते के बाद ईरान ने कहा है कि आने वाले 60 दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान दोनों देशों को संयम बनाए रखना होगा और ऐसे किसी भी राजनीतिक, आर्थिक या सैन्य कदम से बचना होगा, जिससे समझौते के क्रियान्वयन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष समझौते की शर्तों का पालन करते हैं, तो क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी संबंधों में सुधार की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

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