Last Updated: October 22, 2026

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सऊदी अरब में बांग्लादेशी कपल को मौत की सज़ा क्यों दी गई, जानें ताजीर कानून और बांग्लादेश की प्रतिक्रिया

October 22, 2026

सऊदी अरब में बांग्लादेशी कपल को मौत की सज़ा क्यों दी गई, जानें ताजीर कानून और बांग्लादेश की प्रतिक्रिया

सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सज़ा दिए जाने का मामला चर्चा में है। सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के मुताबिक, दोनों को मक्का शहर की एक मस्जिद के अंदर कथित अश्लील हरकत करने के मामले में दोषी पाया गया था। अदालत ने उन्हें इस्लामी कानून के तहत मौत की सज़ा सुनाई, जिसके बाद इस पर अमल किया गया। इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ‘ताजीर’ के तहत दी गई सज़ा को लेकर हो रही है। ताजीर इस्लामी कानून के तहत सज़ा देने का एक तरीका है, जिसमें अपराध की प्रकृति और उसकी सज़ा तय करने का अधिकार जज के पास होता है।

गल्फ न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने सऊदी प्रेस एजेंसी के माध्यम से इस मामले में बयान जारी किया था। बयान में दो लोगों के नाम बताए गए हैं—नजरुल इस्लाम अब्दुल बासिर और स्वीटी अख्तर। मंत्रालय के अनुसार, दोनों बांग्लादेश के नागरिक थे और उन्हें मौत की सज़ा दी गई। बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्टों में नजरुल इस्लाम की उम्र 22 साल बताई गई है। हालांकि, स्वीटी अख्तर की उम्र के बारे में अभी तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

क्या दोनों पति-पत्नी थे
इस मामले को लेकर कई मीडिया रिपोर्टों में दोनों को एक कपल बताया गया है। लेकिन ‘द वीक’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बात की पक्की पुष्टि नहीं हुई है कि दोनों शादीशुदा थे या नहीं। सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने अपने बयान में दोनों को केवल एक पुरुष और एक महिला बताया है। मंत्रालय ने उनके आपसी रिश्ते के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी।

किस आरोप में हुई गिरफ्तारी?
सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक, सुरक्षा अधिकारियों ने दोनों को गिरफ्तार किया था। इसके बाद मामले की जांच की गई और उनके खिलाफ आरोप लगाए गए। मामला अदालत तक पहुंचा, जहां दोनों को दोषी ठहराया गया। मंत्रालय के अनुसार, अदालत ने तीन प्रमुख बातों को ध्यान में रखते हुए सज़ा सुनाई।

अपराध की गंभीरता: कथित हरकत को गंभीर माना गया।

मस्जिद की पवित्रता: घटना एक पवित्र धार्मिक स्थान के अंदर हुई थी।

घटना की परिस्थितियां: जिस समय और जिस स्थिति में कथित हरकत हुई, उसे भी सज़ा तय करते समय ध्यान में रखा गया।

समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी गृह मंत्रालय ने घटना के समय और स्थान की पवित्रता पर विशेष जोर दिया था। गल्फ न्यूज के अनुसार, अदालत के फैसले के बाद एक शाही आदेश भी जारी किया गया, जिसके जरिए मौत की सज़ा पर अमल को मंजूरी दी गई।

सऊदी सरकार ने क्या चेतावनी दी
गृह मंत्रालय ने कहा कि मस्जिदों की पवित्रता का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ इस्लामी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। मंत्रालय ने चेतावनी दी कि इस तरह की हरकत करने वालों को सज़ा का सामना करना पड़ेगा। ‘खलीज टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय के बयान में दूसरों के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले अपराधों का भी जिक्र किया गया था। हालांकि, इस मामले में घटना की पूरी जानकारी, कथित हरकत का विस्तृत विवरण और अदालत के फैसले से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।

किस कानून के तहत दी गई मौत की सज़ा
इस मामले में सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने किसी खास लिखित कानून या उसकी किसी विशेष धारा का नाम नहीं बताया। मंत्रालय ने केवल इतना कहा कि अदालत ने ताजीर के तहत मौत की सज़ा सुनाई थी। ताजीर इस्लामी कानून में सज़ा देने का एक तरीका है। इसमें अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए जज सज़ा तय करता है। आसान शब्दों में समझें तो ताजीर में हर अपराध के लिए सज़ा पहले से निश्चित नहीं होती। जज मामले के तथ्यों और इस्लामी कानून की अपनी व्याख्या के आधार पर फैसला कर सकता है।

इस्लामी कानून में अपराधों की तीन प्रमुख श्रेणियां
सऊदी अरब की कानूनी व्यवस्था में इस्लामी कानून के तहत अपराधों को आम तौर पर तीन श्रेणियों में समझा जाता है।

पहली श्रेणी: हद्द

हद्द के अंतर्गत कुछ ऐसे अपराध आते हैं, जिनके लिए इस्लामी कानून में सज़ा निर्धारित मानी जाती है। इस श्रेणी में सज़ा तय करने के नियम अन्य श्रेणियों की तुलना में अधिक निश्चित होते हैं।

दूसरी श्रेणी: किसास

किसास का संबंध कुछ गंभीर अपराधों, खासकर हत्या और शारीरिक चोट के मामलों में न्याय या बदले के सिद्धांत से है। हालांकि, इन मामलों में लागू नियम और उपलब्ध विकल्प अपराध तथा संबंधित कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।

तीसरी श्रेणी: ताजीर

ताजीर के तहत ऐसे अपराध आते हैं, जिनकी सज़ा हद्द या किसास की तरह उसी प्रकार पहले से निश्चित नहीं होती। इसमें जज अपराध की प्रकृति, परिस्थितियों और लागू कानूनी सिद्धांतों के आधार पर सज़ा तय करता है। मानवाधिकार संगठनों की आलोचना का एक बड़ा कारण यही है कि ताजीर के मामलों में अपराध की परिभाषा और सज़ा तय करने की प्रक्रिया हमेशा स्पष्ट और एक समान नहीं होती।

ताजीर कानून को लेकर मानवाधिकार संगठन क्या कहते हैं?
मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन MENA राइट्स ग्रुप सऊदी अरब की आपराधिक न्याय व्यवस्था को लेकर चिंता जता चुका है। संगठन के मुताबिक, सऊदी अरब में लंबे समय से आपराधिक कानूनों को लिखित और स्पष्ट रूप में निर्धारित करने से जुड़ी समस्याएं रही हैं। ऐसे मामलों में जज इस्लामी कानून की अपनी समझ और व्याख्या के आधार पर तय कर सकते हैं कि किसी मामले में अपराध क्या है और उसके लिए कौन-सी सज़ा दी जानी चाहिए। इससे अदालतों के फैसलों में अंतर आने और आरोपियों को यह स्पष्ट रूप से पता न होने जैसी चिंताएं पैदा होती हैं कि किसी विशेष हरकत के लिए कौन-सी सज़ा दी जा सकती है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में क्या कहा गया था?
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने साल 2008 की अपनी एक रिपोर्ट में सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब में आपराधिक मामलों का बड़ा हिस्सा ताजीर की श्रेणी में आता था। संगठन ने यह भी बताया था कि जज पुराने फैसलों से पूरी तरह बंधे नहीं होते। इस व्यवस्था को लेकर मानवाधिकार संगठनों की चिंता यह है कि जब अपराधों और उनकी सज़ाओं की स्पष्ट सीमाएं तय नहीं होतीं, तो न्यायिक फैसलों में एकरूपता और पारदर्शिता बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

क्या सऊदी अरब ने ताजीर के लिए लिखित कानून बनाने की कोशिश की थी
सऊदी अरब में ताजीर के तहत सज़ा देने की व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिए लिखित कानून बनाने की कोशिश भी की गई थी। फरवरी 2021 में सऊदी अरब ने कहा था कि वह ‘पीनल कोड फॉर डिस्क्रिशनरी सेंटेंसेस’ यानी विवेकाधीन सज़ाओं के लिए एक दंड संहिता का मसौदा तैयार कर रहा है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ताजीर के तहत आने वाले अपराधों और उनकी सज़ाओं को लिखित रूप देना था, ताकि कानूनी प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाया जा सके।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मसौदे पर क्या सवाल उठाए?
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस प्रस्तावित कानून के एक लीक हुए मसौदे की समीक्षा की थी। संगठन की चिंता थी कि इस मसौदे से मौत की सज़ा के इस्तेमाल पर पर्याप्त रोक नहीं लगेगी। यानी, लिखित कानून बनाने की कोशिश के बावजूद मौत की सज़ा दिए जाने की संभावना बनी रह सकती है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जिन स्रोतों का हवाला दिया गया था, उनसे यह पुष्टि नहीं होती कि प्रस्तावित दंड संहिता अंतिम रूप से लागू हुई थी या नहीं। इसलिए इस मामले में ताजीर के तहत सज़ा दिए जाने को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सऊदी अरब की कानूनी व्यवस्था में विवेकाधीन सज़ाओं के नियम किस रूप में लागू हैं।

बांग्लादेश ने क्या प्रतिक्रिया दी
इस मामले में दोनों व्यक्ति बांग्लादेशी नागरिक थे, इसलिए बांग्लादेश की प्रतिक्रिया भी एक अहम पहलू है। हालांकि, यहां उपलब्ध सामग्री में बांग्लादेश सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का पूरा विवरण नहीं है। इसलिए सरकार की ओर से दिए गए किसी बयान, राजनयिक कदम या औपचारिक विरोध के बारे में बिना पुष्टि के दावा करना उचित नहीं होगा। इस मामले पर बांग्लादेश की प्रतिक्रिया को स्पष्ट रूप से समझने के लिए वहां के विदेश मंत्रालय या संबंधित सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक बयान की पुष्टि जरूरी है।

ताजीर कानून के कारण क्यों उठ रहे हैं सवाल?
सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मक्का की एक मस्जिद में कथित अश्लील हरकत के मामले में मौत की सज़ा दिए जाने ने ताजीर के तहत सज़ा तय करने की व्यवस्था पर ध्यान खींचा है। सऊदी गृह मंत्रालय का कहना है कि अदालत ने अपराध की गंभीरता, मस्जिद की पवित्रता और घटना की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फैसला सुनाया था। दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों ने लंबे समय से ताजीर के तहत अपराधों की स्पष्ट परिभाषा, सज़ा तय करने में न्यायिक विवेक और मौत की सज़ा के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। इस पूरे मामले को समझने के लिए दो बातें अहम हैं—पहली, सऊदी अदालत ने किन तथ्यों और कानूनी आधारों पर मौत की सज़ा सुनाई; और दूसरी, ताजीर के तहत सज़ा देने की व्यवस्था में पारदर्शिता और कानूनी स्पष्टता किस हद तक मौजूद है।

 

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