गत गुरुवार को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में अमेरिका के नेतृत्व में गाजा पट्टी के लिए एक नई तथाकथित “बोर्ड ऑफ़ पीस” की शुरुआत की गई। लेकिन जिस मूल मुद्दे को केंद्र में रखकर इस परिषद का गठन किया गया, उसके सबसे अहम पक्षकार ही इस समारोह में अनुपस्थित रहे। न तो इज़राइल का कोई प्रतिनिधि मौजूद था और न ही फिलिस्तीन का। यह स्थिति अपने आप में एक गंभीर विडंबना को उजागर करती है और इस पूरी पहल की मंशा तथा विश्वसनीयता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्नचिह्न लगा देती है।
ज़रा ठहरकर सोचने की ज़रूरत है कि जो देश स्वयं बार-बार सैन्य संघर्षों में शामिल रहा है और वैश्विक स्तर पर टैरिफ़ जैसे मुद्दों पर अन्य देशों से टकराव की नीति अपनाता रहा है, यदि वही देश “बोर्ड ऑफ़ पीस” का नेतृत्व करे, तो क्या उससे वास्तविक और टिकाऊ शांति की उम्मीद की जा सकती है। यही वह मूल प्रश्न है, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के भीतर व्यापक संदेह को जन्म दिया है। हालिया प्रामाणिक विश्लेषणों के समग्र आकलन से यह संकेत मिलता है कि इस आयोग के गठन के उद्देश्य, उसकी कार्यप्रणाली और संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर मतभेद और विवाद मौजूद हैं। ‘शांति’ के नाम पर प्रस्तुत इस पहल के वास्तविक स्वरूप को लेकर गहरी शंका व्यक्त की जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस नए गठन को लेकर स्पष्ट रूप से संशकित और सतर्क दिखाई देता है। प्रमुख चिंता यह है कि यह परिषद, जिसके प्रस्तावित कार्य संयुक्त राष्ट्र के शांति और सुरक्षा से जुड़े दायित्वों से मेल खाते हैं, कहीं संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमज़ोर करने और उसके स्थान पर एक वैकल्पिक ढांचा खड़ा करने का साधन न बन जाए। कई देशों को यह भी आशंका है कि अमेरिका इसे एक प्रकार की ‘चालाकी से हड़पने वाली व्यवस्था’ में बदल सकता है, जिसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को दरकिनार कर अपने प्रभाव का विस्तार किया जाए।
इस पहल को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन न मिल पाना भी इसकी सीमाओं को रेखांकित करता है। अमेरिका के अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अन्य स्थायी सदस्य चीन, रूस, ब्रिटेन और फ़्रांस इससे दूरी बनाए हुए हैं। इतना ही नहीं, फ़्रांस, जर्मनी और नॉर्वे जैसे कई पश्चिमी देशों ने भी इसमें शामिल होने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। जर्मनी के विदेश मंत्री का यह सीधा बयान कि दुनिया के पास पहले से ही एक बोर्ड ऑफ़ पीस मौजूद है, और वह संयुक्त राष्ट्र है, इस पूरे प्रयास पर एक सख़्त टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष जैसे जटिल और अत्यंत संवेदनशील मुद्दे का समाधान केवल एक समावेशी, न्यायसंगत और संतुलित प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है, जिसमें सभी पक्षों, विशेषकर फिलिस्तीनियों की वास्तविक और सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। किसी एक पक्ष के प्रभाव में संचालित या संयुक्त राष्ट्र जैसे सार्वभौमिक और स्वीकृत मंच को दरकिनार करने वाली कोई भी व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक प्रतीत होती है, बल्कि क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति और स्थिरता के प्रयासों को भी नुकसान पहुँचा सकती है।
गाजा में वास्तविक शांति की राह स्थानीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सभी हितधारकों को साथ लेकर चलने, संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के भीतर काम करने और ‘दो-राष्ट्र समाधान’ पर गंभीर तथा निरंतर संवाद को आगे बढ़ाने से ही निकल सकती है। ऐसी किसी ‘परिषद’ से, जिसमें संघर्ष के मुख्य पक्ष ही शामिल न हों, ठोस समाधान की अपेक्षा करना कठिन है। इस संदर्भ में यह पहल एक निर्णायक कदम कम और एक राजनीतिक प्रदर्शन अधिक प्रतीत होती है।
(लेखक—रमेश शर्मा)
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