इंटरनेशनल डेस्क : वैश्विक स्तर पर ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तिलमिला गए हैं। ब्रिक्स की नीतियों से जुड़ने वाले देशों पर दस प्रतिशत से के अतिरिक्त टैरिफ लगाने की उनकी घोषणा उनकी तिलमिलाहट का ही नतीजा है। ट्रंप ने कहा है कि जो देश ब्रिक्स की अमेरिका विरोधी नीतियों का साथ देंगे, उन पर अमेरिका दस प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा देगा। माना जा रहा है कि ट्रंप की यह तिलमिलाहट ब्रिक्स देशों की ओर से ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमले की आलोचना के बाद आया है। ब्रिक्स देशों ने यह आलोचना ब्राजील में हुए अपने शिखर सम्मेलन में एक बयान के जरिए जारी की है।
ब्रिक्स में दुनिया के प्रभावशाली 10 देश सदस्य हैं। हालांकि ब्रिक्स की शुरूआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर की थी, लेकिन अब इसके सदस्यों में मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं। साफ है कि ब्रिक्स अब ऐसा संगठन बन गया है, जिसकी पहूंच यूरोप और एशिया के साथ ही दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका महाद्वीप तक है। ब्रिक्स की ओर से ईरानी परमाणु और सैन्य सुविधाओं पर अमेरिकी-इजरायल हमलों की निंदा एक तरह से दुनिया की चालीस प्रतिशत आबादी और चालीस प्रतिशत अर्थव्यवस्था की अभिव्यक्ति है। अमेरिका इसी वजह से तिलमिलाया है। उसे ऐसा लग रहा है कि ब्रिक्स के जरिए उसके आर्थिक साम्राज्य को वैश्विक स्तर पर चुनौती मिल रही है।
संदर्भ के लिए जान लेना चाहिए कि ब्रिक्स देशों की कुल अर्थव्यवस्था 77 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 40 प्रतिशत है। साल 2023 के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों की कुल जीडीपी लगभग 27.24 ट्रिलियन डॉलर है। इसके साथ ही गौरतलब तथ्य यह है कि ब्रिक्स देशों में दुनिया की करीब चालीस प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस वजह से ब्रिक्स देश दुनिया में सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में भी उभर रहे हैं। अगर क्रय शक्ति समानता की बात करें तो साल 2018 के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों ने जी7 देशों की विश्व की कुल जीडीपी में हिस्सेदारी को पीछे छोड़ दिया है। यहां यह ध्यान देना होगा कि आर्थिक रूप से सबसे ताकतवर और प्रभावी माने जाने वाले जी 7 देशों के बास दुनिया की जीडीपी का सिर्फ तीस प्रतिशत हिस्सा ही है। जाहिर है कि इनकी वजह से अमेरिका परेशान है।
बेशक ट्रंप ने फिर से ट्रैरिफ बढ़ाने की धमकी दी है। लेकिन सत्ता संभालने के बाद से ही वे दुनिया पर टैरिफ की अंधाधुंध वृद्धि करके एक तरह से दुनिया को आर्थिक धमकी ही दे रहे हैं। ब्रिक्स में इसकी आलोचना एक तरह से वैश्विक अगुआ बने फिर रहे अमेरिका को आइना दिखाना है। संयुक्त घोषणा पत्र में यह कहना कि ऐसे कदमों से वैश्विक व्यापार कमजोर और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा उत्पन्न होने का खतरा है, भी एक तरह से अमेरिकी रूख की वैश्विक स्तर पर प्रभावी आलोचना है। ब्रिक्स की ओर से गाजा पट्टी में चल रहे युद्ध पर कड़ा रूख अपनाना भी अमेरिकी रूख के खिलाफ कदम है। ट्रंप का जो स्वभाव है, उनकी जैसी राजनीति रही है, उनकी ओर से ऐसे कदम उठाना अस्वाभाविक भी नहीं है। लेकिन ब्रिक्स देशों को चाहिए कि अमेरिकी वर्चस्व वाली आर्थिकी के ब्रिक्स खुद को वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के रूप में उभारें। ब्रिक्स के उद्देश्यों को हासिल करने की दिशा में यह अहम कदम साबित हो सकेगा।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

