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चीन–भारत संबंध 2025: 75 वर्षों की यात्रा और भविष्य की संभावनाएँ

December 21, 2025

चीन–भारत संबंध 2025: 75 वर्षों की यात्रा और भविष्य की संभावनाएँ

इंटरनेशनल डेस्क: भारत और चीन के आधुनिक इतिहास में एक रोचक समानता देखने को मिलती है। भारत ने 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की और ठीक उसके दो वर्ष बाद, 1949 में, चीन में साम्यवादी क्रांति सफल हुई। यह एक ऐतिहासिक संयोग था जिसने दोनों पड़ोसी देशों के भाग्य को एक नया मोड़ दिया। इसके बाद भारत ने एक अहम कदम उठाते हुए, गैर-साम्यवादी देशों में पहले बनकर, नवगठित पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन को राजनयिक मान्यता प्रदान की। इसी के फलस्वरूप, 1950 में दोनों राष्ट्रों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए, जिन्होंने अब 75 वर्षों का एक लंबा और जटिल सफर पूरा कर लिया है।

आज, इन 75 वर्षों के अनुभव के बाद, भारत-चीन संबंध एक नए और अधिक जटिल चरण में प्रवेश कर चुके हैं। यह रिश्ता अब तीन मुख्य स्तंभों पर केंद्रित है: पारस्परिक आर्थिक लाभ और विकास में सहयोग, क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता की साझा जिम्मेदारी, और व्यावहारिक कूटनीति के माध्यम से मतभेदों का प्रबंधन। दोनों देश एक ओर जहाँ अपनी-अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सुरक्षा चिंताओं को संबोधित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर व्यापार, निवेश और वैश्विक मुद्दों पर सीमित सहमति के क्षेत्रों की तलाश जारी है।

इस वर्ष सीमा पर शांति बहाल हुई, लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला दर्रों से सीमांत व्यापार फिर शुरू हुआ। पर्यटक वीजा चीनी नागरिकों के लिए बहाल हुए, लंबी अवधि के व्यावसायिक वीजा शुरू किए गए और पेइचिंग-मुंबई तथा दिल्ली-शांगहाई के बीच सीधी उड़ानें का संचालनसितंबर से फिर से शुरू हो गया है। एससीओ शिखर सम्मेलन के साइडलाइन्स पर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक में विकास साझेदारी पर जोर दिया गया, साथ ही ब्रिक्स 2026-27 के लिए एक-दूसरे का समर्थन करने का समझौता हुआ। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न हुए यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज फोरम में शिरकत करने आए चीनी डेलीगेट्स ने यहाँ के मौनुमेंटस का दौरा किया और तारीफ़ की अगले साल यह सम्मेलन चीन में होने जा रहा है जिसके लिए भारत ने चीन को बधाई और शुभकामनाएँ दी।

राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर भारत और चीन के बीच बढ़ती आपसी समझ का संकेत शंघाई में भारत के नए और आधुनिक वाणिज्य दूतावास की शुरुआत से मिलता है। लगभग 1,436.63 वर्गमीटर क्षेत्र में स्थापित यह कॉन्सुलेट पूर्वी चीन में भारतीय समुदाय को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करेगा और साथ ही भारत आने वाले चीनी व्यापारियों व पर्यटकों के लिए भी उपयोगी साबित होगा। वीज़ा, व्यापार और सांस्कृतिक सेवाओं को एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने से दोनों देशों के बीच संपर्क और व्यापारिक रिश्तों को मजबूती मिलने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि भारत ने 32 वर्षों बाद अपने वाणिज्य दूतावास को एक अधिक बड़े और आधुनिक परिसर में स्थानांतरित किया है।

द्विपक्षीय व्यापार पहले दो माह में 23.6 अरब डॉलर पहुंचा, ई-कॉमर्स में लॉजिस्टिक्स लागत 15% घटी। भारतीय नागरिकों को 70,000 से अधिक वीजा जारी हुए, जो 15% की वृद्धि दर्शाता है। कायलाश मानसरोवर यात्रा 2026 से बढ़ेगी और नदी जल डेटा साझा करने पर सहमति बनी।

2026 में संबंध स्थिर रहेंगे, सीमा पर विशेषज्ञ समूह गठित होगा और वरिष्ठ अधिकारी वार्ता आगे बढ़ेगी। ब्रिक्स तथा एससीओ जैसे मंचों पर सहयोग बढ़ेगा, आर्थिक एकीकरण से व्यवसायों को लाभ होगा। हालांकि सीमा विवाद बरकरार है, लेकिन दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग पर केंद्रित रहेंगे, जो क्षेत्रीय शांति के लिए सकारात्मक है।

इस हीरे की वर्षगांठ पर, भविष्य का मार्ग एक साझा दृष्टि की माँग करता है। वह दृष्टि यह हो सकती है कि प्रतिस्पर्धा और असहमति के बावजूद, संवाद और विवेक के बल पर संबंधों में टकराव को नियंत्रित रखा जाए और सहयोग के उन अवसरों को आगे बढ़ाया जाए, जो दोनों देशों की 2.8 अरब से अधिक जनता के कल्याण और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हों।

2025 में देखी गई सकारात्मक गति एक नई शुरुआत की ओर इशारा करती है। भविष्य का मार्ग संभवतः आसान नहीं होगा, और मतभेद बने रहेंगे। लेकिन व्यावहारिकता, परिपक्वता और एक दूसरे की विकासात्मक आकांक्षाओं के प्रति सम्मान के साथ, दोनों देश प्रतिस्पर्धा और सहयोग के एक जटिल समीकरण को संतुलित कर सकते हैं। सीमा पर शांति, आर्थिक संबंधों में संतुलन, और वैश्विक मुद्दों पर रचनात्मक संवाद – ये तीन स्तंभ भविष्य के चीन-भारत संबंधों की नींव रख सकते हैं, जिससे एशियाई शताब्दी की वास्तविक क्षमता का लाभ उठाया जा सके।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)

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