मध्य पूर्व दशकों से संप्रदायिक तनाव, गृह युद्ध, आतंकवाद, तेल की राजनीति और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है। 2026 की शुरुआत में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच टकराव तेज होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर हुई है। मई 2026 तक ऊर्जा बाजार बुरी तरह प्रभावित है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें बार-बार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जा रही हैं, कभी-कभी 120 डॉलर तक पहुंच रही हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे दुनिया का लगभग 20% तेल और LNG गुजरता है, मई 2026 तक गंभीर नौवहन व्यवधान की चपेट में है। अमेरिका के नेतृत्व में ईरानी बंदरगाहों और टर्मिनलों पर लगाई गई नौसैनिक नाकाबंदी ने तेल टैंकरों की आवाजाही घटा दी है, जिसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी विदेशी जहाजों के लिए बंद कर दिया है, जिससे संकट और गहरा हो गया है। इस पृष्ठभूमि में यह तर्क कमजोर लगता है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका का सैन्य हमला ‘आत्मरक्षा’ था—यह कार्रवाई क्षेत्र को और अस्थिरता की ओर धकेलती है।
ऐसे माहौल में चीन का दृष्टिकोण अलग है। पश्चिम, विशेषकर अमेरिका-नेतृत्व वाला पश्चिमी विश्व, लंबे समय से “शक्ति से शांति” के मॉडल पर निर्भर रहा है, जबकि चीन आर्थिक विकास और सहयोग के जरिए गरीबी और अस्थिरता जैसी समस्याओं की जड़ पर काम करता है। चीन का अपना अनुभव दिखाता है कि स्थिरता और समृद्धि साथ-साथ चल सकती हैं। यही वजह है कि उसका विकास मॉडल और आर्थिक जुड़ाव मध्य पूर्व के संघर्ष-ग्रस्त इलाकों में स्थिरता लाने का एक व्यावहारिक विकल्प पेश करते हैं। मध्य पूर्व को अभी स्थिरता की सबसे ज्यादा जरूरत है, और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) इस दिशा में ठोस कदम है। बुनियादी ढांचे में निवेश और व्यापार को बढ़ावा देकर चीन साझा हित और आपसी निर्भरता बनाता है, जिससे संघर्ष की संभावना स्वाभाविक रूप से कम होती है।
मध्य एशिया और खाड़ी क्षेत्र बेल्ट एंड रोड पहल के उच्च गुणवत्ता वाले सह-निर्माण के लिए अग्रणी बनकर उभरे हैं। चीन और अरब देशों ने BRI के तहत बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में 200 से अधिक बड़ी परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनसे दोनों क्षेत्रों के लगभग 2 अरब लोगों को सीधा लाभ पहुंचा है। इसके साथ ही, चीन की गैर-हस्तक्षेप नीति पश्चिमी देशों के अक्सर हस्तक्षेप करने वाले रुख के मुकाबले एक संतुलित और भरोसेमंद विकल्प लगती है—एक ऐसा विकल्प जो संवाद और सहयोग से स्थायी शांति की जमीन तैयार करता है।
चीन व्यापार, निवेश और संवाद के जरिए भरोसा बनाकर शांति को टिकाऊ बनाने की कोशिश कर रहा है। इसका उदाहरण 6 मई 2026 को पेइचिंग में चीनी विदेश मंत्री वांग यी और ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराक़ची की वार्ता में दिखा। बैठक में वांग यी ने कहा कि चीन ईरान की राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा का समर्थन करता है और तेहरान द्वारा कूटनीतिक तरीके से राजनीतिक समाधान तलाशने की सराहना करता है। अराक़ची ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने पर चर्चा जल्द शुरू हो सकती है और तनाव रोकने में चीन की रचनात्मक भूमिका की सराहना की।
28 फरवरी 2026 को ईरान पर हुए अमेरिका-इज़राइल के हमलों के बाद से चीन ने तनाव घटाने, शांति वार्ता को आगे बढ़ाने और क्षेत्र में स्थिरता लौटाने में लगातार रचनात्मक भूमिका निभाई है। सैन्य दबाव के मुकाबले व्यापार, निवेश और संवाद पर टिका चीन का दृष्टिकोण क्षेत्रीय भरोसा बढ़ा रहा है। ईरान समेत मध्य पूर्वी देशों के लिए चीन अब एक भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है, जो राजनीतिक आपसी विश्वास गहरा करने और व्यावहारिक सहयोग बढ़ाकर स्थायी शांति की नींव रखना चाहता है। अप्रैल 2026 के मध्य में, बढ़ते तनाव के बीच, चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात में मध्य पूर्व के लिए चार-सूत्रीय शांति पहल पेश की। यह पहल एक ऐसा विकल्प जो संप्रभुता और विकास को केंद्र में रखकर संघर्ष सुलझाने की “चीनी समझ”देता है।
मध्य पूर्व के संघर्षों का असर अफ्रीकी देशों तक फैल रहा है और पहले से दबाव में चल रहे परिदृश्य पर नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है। ऐसे समय में चीन अफ्रीका के साथ खड़े होकर इन चुनौतियों से निपटने और मिलकर शांति व साझा विकास को बढ़ावा देने के लिए तैयार है। विकास और उच्च-स्तरीय खुलेपन पर रणनीतिक फोकस बनाए रखते हुए, चीन हमेशा अफ्रीका को विशेष और प्राथमिक साझेदार मानता आया है। 1 मई 2026 से चीन ने कूटनीतिक संबंध रखने वाले सभी 53 अफ्रीकी देशों के लिए शून्य-शुल्क व्यवस्था लागू कर दी है। इसके साथ ही ग्रीन चैनल और अन्य पहलों को उन्नत करके अफ्रीकी उत्पादों की चीनी बाजार तक पहुंच बढ़ाई जा रही है। मकसद साफ है: व्यापार और सहयोग को स्थिरता का आधार बनाकर पूरे महाद्वीप में विकास और लचीलापन मजबूत करना।
नतीजा साफ है। मध्य पूर्व का मौजूदा संकट उस पुराने वर्चस्ववादी ढांचे की नाजुकता को बेनकाब कर रहा है—जहां सैन्य हस्तक्षेप और प्रतिबंधों ने शांति की जगह अस्थिरता दी है। इसी पृष्ठभूमि में चीन का स्थिर आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र और “विकास से सुरक्षा” पर आधारित दृष्टिकोण उसे वैश्विक व्यवस्था का असली स्थिरीकरण कारक बना रहा है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक- रविशंकर बसु)