जब दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियां- चीन और अमेरिका- फिर एक बार बातचीत की मेज पर आमने-सामने आईं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनें कुछ पल को थम-सी गईं। 8 से 13 जून तक यूके की राजधानी लंदन में दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक परामर्श व्यवस्था के अंतर्गत पहली उच्च-स्तरीय बैठक आयोजित हो रही है। यह बातचीत भले देर से शुरू हुई हो, लेकिन इसका महत्व सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के लिए भी निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।
विगत वर्षों में दोनों देशों के बीच चले व्यापार युद्ध, तकनीकी पाबंदियां और संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा के बाद अब इस वार्ता का होना एक मजबूत संकेत देता है कि लंबे समय तक चले टकराव में कोई स्थायी विजेता नहीं होता। दोनों ही पक्ष अच्छी तरह समझ चुके हैं कि इस आर्थिक खिंचतान की कीमत कोई भी अकेले नहीं उठा सकता। वार्ता के मुद्दे जटिल और संवेदनशील हैं, और इनमें तीन प्रमुख क्षेत्र सामने आए हैं, जो चीन-अमेरिका के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की गहराई को उजागर करते हैं।
पहला विषय है प्रौद्योगिकी निर्यात नियंत्रण। सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के खिलाफ अमेरिकी तकनीकी पाबंदियों पर पुनर्विचार इस बार की वार्ता का अहम हिस्सा है। अमेरिका, जो अब तक इस क्षेत्र में ‘अपरक्राम्य’ रुख अपनाए हुए था, उसमें नरमी के संकेत मिल रहे हैं। इसके पीछे प्रमुख वजह है चीन की तेज़ होती तकनीकी प्रगति और वैश्विक औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी बढ़ती हिस्सेदारी। जब प्रतिबंध चीन को नहीं रोक पा रहे, उल्टे अमेरिकी कंपनियों को ही घाटा हो रहा है, तो संतुलन बनाना अब अपरिहार्य हो गया है।
दूसरा अहम मुद्दा है ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता। वार्ता से ठीक पहले अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने चीन को परमाणु ऊर्जा उपकरणों के निर्यात का लाइसेंस अचानक रद्द कर दिया। इस फैसले की टाइमिंग सधी हुई है और इसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक मंशा झलकती है। यह केवल दबाव की रणनीति नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गहराती रणनीतिक होड़ का संकेत है। जवाब में चीन ने अमेरिका से आग्रह किया कि वह ज़मीनी हकीकत को स्वीकार करे और चीन विरोधी रवैये को पलटे। इससे स्पष्ट है कि ऊर्जा अब प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा बन चुकी है।
तीसरा और शायद सबसे अहम मुद्दा है ‘दुर्लभ मिट्टी बनाम चिप’ की लड़ाई। चीन ने दुर्लभ मिट्टी के निर्यात पर नियंत्रण लगाकर अमेरिका के उच्च तकनीकी विनिर्माण को सीधा निशाना बनाया है, जिससे अमेरिकी ऑटो उद्योग पर संकट मंडराने लगा। अमेरिका अब अपने संसाधनों की प्रोसेसिंग के लिए चीन पर निर्भर होता जा रहा है। दूसरी तरफ, अमेरिका ने चिप तकनीक में चीन के खिलाफ कड़े अवरोध खड़े किए हैं। यह सदी की उस मुकाबले की झलक है, जहां ‘संसाधन अधिकार’ और ‘तकनीकी अधिकार’ एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। इस नाजुक संतुलन में दोनों देशों की राजनीतिक सूझबूझ की असली परीक्षा हो रही है।
हालांकि इन सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा गहरी है, लेकिन बातचीत की बहाली अपने-आप में एक सकारात्मक संकेत है। आपूर्ति श्रृंखला में आई दरारों से अमेरिकी कंपनियों को हुए नुकसान और चीनी तकनीकी कंपनियों के सामने खड़े अवरोधों ने बातचीत को आवश्यक बना दिया। प्रतिनिधियों का स्तर ऊंचा हुआ है, चर्चा के दायरे बढ़े हैं, और इससे यह भी स्पष्ट है कि दोनों देश अब मतभेदों को एक व्यवस्थित ढंग से सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।
दुनिया भर के बाजारों की निगाहें इस वार्ता पर टिकी हैं। चीन और अमेरिका के बीच होने वाली कोई भी प्रगति वैश्विक आर्थिक स्थिरता को मजबूती दे सकती है। यह वार्ता न सिर्फ इन दो महाशक्तियों के आर्थिक भविष्य को आकार दे रही है, बल्कि यह तय भी कर रही है कि आने वाले समय में वैश्वीकरण की दिशा क्या होगी।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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