हाल ही में चाइना मीडिया ग्रुप ने नई दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रोफेसर और ‘नेशन-स्टेट डायलॉग’ की संस्थापक डॉ. गीता कोछड़ से विशेष बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने बोआओ फ़ोरम और एशिया की बदलती आर्थिक दिशा पर विस्तार से अपने विचार रखे।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि बोआओ फ़ोरम फॉर एशिया अब केवल एक वार्षिक सम्मेलन नहीं रहा, बल्कि एशिया के सामूहिक भविष्य को आकार देने वाला एक अहम मंच बन चुका है। 24 से 27 मार्च तक दक्षिण चीन के हाईनान प्रांत में आयोजित यह फ़ोरम एशियाई देशों को एक साथ लाता है। यहां देश अपने-अपने विकास मॉडल साझा करते हैं और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक साझा आर्थिक दृष्टिकोण तैयार करने की कोशिश करते हैं।
जेएनयू प्रोफेसर डॉ. कोछड़ के अनुसार, इस वर्ष के सम्मेलन की विशेषता यह है कि एशिया अपने विकास की रूपरेखा स्वयं तय करने की दिशा में और अधिक स्पष्टता के साथ आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। बोआओ में होने वाली चर्चाएं यह संकेत देती हैं कि क्षेत्रीय सहयोग को मज़बूत किए बिना कोई भी देश अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ण रक्षा नहीं कर सकता। दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और अन्य क्षेत्रों से आए प्रतिनिधि अपने-अपने देशों की चुनौतियां, सफलताएं और नीतिगत प्राथमिकताएं साझा करते हैं, जिससे एशिया के लिए एक व्यापक और व्यावहारिक रोडमैप उभर कर सामने आता है।
बातचीत के दौरान, डॉ. गीता कोछड़ ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में अमेरिकी व्यापार नीतियां, खासकर टैरिफ़ और संरक्षणवाद, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आई हैं। उनका मानना है कि अमेरिका अपनी आर्थिक बढ़त बनाए रखने के लिए ऐसी नीतियां अपना रहा है, जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर भारत और चीन, की प्रगति को सीमित कर सकती हैं। इससे वैश्विक व्यापार में अस्थिरता बढ़ती है और विकासशील देशों के लिए संतुलित अवसर कम हो जाते हैं। ऐसे माहौल में एशियाई देशों के लिए यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि वे पश्चिमी निर्भरता से आगे बढ़कर आपसी सहयोग को मजबूत करें।
उन्होंने भारत और चीन की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा कि ये दोनों देश न केवल जनसंख्या के लिहाज़ से बड़े हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने की क्षमता भी रखते हैं। दोनों देशों की विकास दर वैश्विक औसत से अधिक बनी हुई है और द्विपक्षीय व्यापार भी लगातार बढ़ रहा है। अगर ये दोनों देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग का रास्ता अपनाते हैं, तो वे वैश्विक जीडीपी में निर्णायक योगदान दे सकते हैं और आर्थिक संतुलन को नई दिशा दे सकते हैं।
बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में कोई भी देश अकेले आगे नहीं बढ़ सकता। ‘राष्ट्रीय हित’ जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही ज़रूरी क्षेत्रीय सहयोग भी है। इसी संदर्भ में “एशिया फ़ॉर एशियंस” का विचार सामने आता है, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि एशिया के विकास की रूपरेखा एशियाई देश खुद तय करें। वहीं “साझा स्थान” की अवधारणा भारत और चीन के बीच ऐसे क्षेत्रों की तलाश पर बल देती है, जहां मिलकर काम करने से पूरे क्षेत्र को लाभ मिल सके।
प्रोफेसर डॉ. कोछड़ का मानना है कि एशिया के पास संसाधनों, मानव शक्ति और आर्थिक क्षमता की कोई कमी नहीं है। ज़रूरत केवल इस बात की है कि देश आपसी प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर साझा लक्ष्यों की ओर बढ़ें। उनका निष्कर्ष साफ़ है कि भारत और चीन का सहयोग केवल कूटनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि एशिया को वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जाने का एक अनिवार्य रास्ता है। बदलती वैश्विक राजनीति और पश्चिमी दबावों के बीच यही साझेदारी एशिया को अधिक आत्मनिर्भर, संतुलित और मज़बूत भविष्य की ओर ले जा सकती है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)