चीन की राजनीतिक व्यवस्था में आयोजित होने वाला वार्षिक ‘दो सत्र’ केवल एक विधायी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह देश की भविष्यगामी नीतियों का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत संकेतक भी है। नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (NPC) और चाइनीज़ पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (CPPCC) के इस समागम को चीन का सर्वोच्च राजनीतिक महाकुंभ माना जाता है, जहां देश के लगभग पांच हज़ार प्रतिनिधि एकत्रित होकर राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और नीतिगत दिशाओं का निर्धारण करते हैं।
जेएनयू के प्रोफेसर तथा चीनी एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार ने CGTN हिन्दी के साथ एक विशेष बातचीत में कहा कि यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चीन की आंतरिक शासन व्यवस्था और उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। उनके अनुसार, इस प्रक्रिया से यह संकेत भी मिलता है कि चीन अब एक नए संरचनात्मक प्रतिमान की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आर्थिक मोर्चे पर चीन अपनी विकास यात्रा के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। देश अब पारंपरिक निर्यात-उन्मुख मॉडल से आगे बढ़ते हुए घरेलू उपभोग और आंतरिक मांग पर आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में व्यापक रूपांतरण कर रहा है।
प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार के विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान समय में चीन का प्रमुख ज़ोर ऐसी आत्मनिर्भरता विकसित करने पर है, जो उसे बाहरी आर्थिक और भू-राजनीतिक झटकों से सुरक्षित रख सके। उनका कहना है कि यह परिवर्तन रणनीतिक रूप से आवश्यक हो गया है, क्योंकि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और मध्य-पूर्व में जारी संघर्षों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में लगातार बाधाएँ उत्पन्न की हैं। पेट्रोलियम और उच्च तकनीक जैसे क्षेत्रों में बाहरी निर्भरता को कम करना अब चीन की एक महत्त्वपूर्ण रक्षात्मक और सक्रिय प्राथमिकता बन चुका है। यह केवल आर्थिक सुधार की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक प्रकार का ‘रणनीतिक विच्छेदन’ भी है, जिसके माध्यम से चीन अपनी उभरती मध्यमवर्गीय आबादी को पश्चिमी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की अस्थिरताओं से बचाने का प्रयास कर रहा है।
प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार ने यह भी कहा कि शासन प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर चीन का ‘जन-केंद्रित’ दृष्टिकोण और स्पष्ट रूप से सामने आता है। पश्चिमी पूंजीवादी मॉडलों के विपरीत, जहां नीतियां प्रायः बड़े व्यापारिक समूहों और हथियार उद्योग के हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई देती हैं, चीन अपने विकास की सफलता का पैमाना सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता को मानता है।
डॉ. कुमार के अनुसार, चीन में निर्मित विश्वस्तरीय सड़कें, तेज़ रफ़्तार रेल नेटवर्क और आधुनिक मेट्रो प्रणालियाँ इसी ‘जन-केंद्रित’ विकास दृष्टिकोण का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उनका मानना है कि जहां कई पश्चिमी लोकतंत्रों में सैन्य व्यय को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं चीन अपने सामाजिक अनुबंध को मज़बूत बनाए रखने के लिए नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं पर निवेश को स्थिरता का प्रमुख आधार मानता है। यह तुलनात्मक अंतर इस बात को समझने में मदद करता है कि चीन किस प्रकार आंतरिक सामाजिक एकता को बनाए रखते हुए और अपने नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाते हुए एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।
चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना के संदर्भ में बोलते हुए प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार ने कहा कि यह योजना देश के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों का एक महत्वाकांक्षी खाका प्रस्तुत करती है। इस योजना के केंद्र में हरित ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और निम्न-कार्बन उत्सर्जन जैसी आधुनिक तकनीक आधारित प्राथमिकताएँ शामिल हैं। उनके अनुसार, इस दौर में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परिवर्तन भी देखने को मिल रहा है, जिसे ‘शहर-से-गाँव’ प्रवाह के रूप में समझा जा सकता है। यह प्रवृत्ति 1978 में शुरू हुए ‘सुधार और खुलेपन’ के उस दौर से भिन्न है, जब विकास की धारा मुख्यतः ‘गाँव-से-शहर’ की ओर प्रवाहित हुई थी।
उन्होंने कहा कि इस नई नीति का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों का पुनरुद्धार करना, वहां रोज़गार के नए अवसर पैदा करना और सबसे महत्वपूर्ण रूप से खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल करना है। डॉ. कुमार के अनुसार, चीन अब यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके गांव केवल श्रम के स्रोत बनकर न रह जाएं, बल्कि वे आत्मनिर्भर आर्थिक इकाइयों के रूप में विकसित हों।
उनका मानना है कि यह रणनीति न केवल शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच की खाई को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के उस बुनियादी स्तंभ को भी मज़बूत करती है, जिसके तहत खाद्य और ऊर्जा के लिए बाहरी दुनिया पर निर्भरता को न्यूनतम करना चीन की दीर्घकालिक प्राथमिकताओं में शामिल है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)