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फुटबॉल के मैदान पर अमेरिकी साम्राज्यवादी चेहरा: लाल कार्ड पर ‘सस्पेंडेड सज़ा’ का मखौल

क्या आपने कभी सोचा था कि फुटबॉल का सबसे पवित्र मंच- फीफा विश्व कप भी अमेरिकी ‘विशेषाधिकार‘ की चपेट में आ सकता है? 2026 विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में बेल्जियम और अमेरिका के बीच एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने पूरी दुनिया के फुटबॉल प्रेमियों को हतप्रभ कर दिया। अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगन, जो पिछले मैच में घिनौने फाउल के लिए सीधा लाल कार्ड पाकर बाहर हो गए थे, उन पर एक मैच का प्रतिबंध लगना तय था। लेकिन वे बेल्जियम के ख़िलाफ़ बिना किसी झिझक के मैदान पर उतरे। अगर यह फीफा (FIFA) के नियमों का मज़ाक नहीं, तो और क्या है?

इस अजीबोगरीब फैसले को फीफा ने ‘एक साल के लिए निलंबित सज़ा‘ का लेबल देकर पेश किया। यानी बालोगन पर प्रतिबंध तो है, पर वह लागू अगले साल होगा– मानो सज़ा को किसी सब्ज़ी की तरह फ्रिज में रख दिया गया हो। अब सवाल यह है कि क्या किसी और देश के खिलाड़ी को ऐसी ‘रियायत‘ मिलती? क्या नाइजीरिया या ईरान का कोई फुटबॉलर इसी बहाने मैदान पर उतर सकता था? बिल्कुल नहीं। यह ‘सस्पेंशन‘ नियमों का लचीलापन नहीं, बल्कि अमेरिकी शक्ति के आगे फीफा का आत्मसमर्पण है।

देखा जाए तो लाल कार्ड का मतलब हमेशा से स्पष्ट रहा है – तत्काल निष्कासन और अगले मैच पर प्रतिबंध। यह इतना बुनियादी नियम है कि किसी नौसिखिए को भी पता होता है। लेकिन जब यही नियम अमेरिका के ख़िलाफ़ जाता है, तो अचानक फीफा को ‘लचीलापन‘ याद आ जाता है और ‘अंतरराष्ट्रीय मानकों‘ के हवाले से सज़ा टाल दी जाती है। क्या यह ‘अंतरराष्ट्रीय मानक‘ है या विशुद्ध रूप से ‘अमेरिकी मानक‘? यह वही पुरानी कहानी है– जब यहूदी-विरोध, इस्लामोफोबिया या रंगभेद की बात आती है, तो अमेरिका दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है, पर जब अपने खिलाड़ी पर नियम लागू होने की बारी आती है, तो वही अमेरिका ‘विशेष दर्जे‘ की मांग करने लगता है।

पूरे विश्व कप का रोमांच इस बात पर टिका है कि हर टीम को एक समान और निष्पक्ष रेफरिंग मिले। लेकिन बालोगन का यह मामला खेल की इसी आधारशिला पर हथौड़ा मारता है। अगर अमेरिकी दबाव में सज़ा टाली जा सकती है, तो कल कोई और शक्तिशाली देश अपने खिलाड़ी की डोपिंग या नस्लीय टिप्पणी पर भी ‘सस्पेंशन‘ की मांग करेगा। फीफा ने इस फैसले से अपने ही रेफरियों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाई है। अब मैदान पर रेफरी को कौन गंभीरता से लेगा, जब उनके फैसलों को फीफा के बंद कमरों में बैठकर ‘व्यवस्थित‘ कर दिया जाएगा?

सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि अमेरिकी टीम इस विश्व कप में वास्तव में बेहतरीन फुटबॉल खेल रही है। मौरिसियो पोचेटिनो की कोचिंग में उनकी रणनीति, आक्रमण और बचाव सराहनीय हैं। लेकिन इस समय उनकी खेल क्षमता पर ध्यान देने के बजाय पूरी दुनिया इस विवादित फैसले पर बात कर रही है। अमेरिकी खिलाड़ियों की मेहनत इस विवाद की भेंट चढ़ गई है, और वह भी उनके अपने ही फुटबॉल संघ की मनमानी के कारण। क्या यह अमेरिकी फुटबॉल के लिए गौरव की बात है कि वे जीतें या हारें, चर्चा सिर्फ उनके ‘विशेषाधिकार‘ की हो? नहीं, यह तो उनकी नैतिक पराजय है।

हम यह नहीं कह रहे कि बालोगन बुरे खिलाड़ी हैं या अमेरिका को टूर्नामेंट से बाहर होना चाहिए था। हमारा सरोकार सिर्फ खेल की आत्मा यानी निष्पक्षता से है। अगर नियमों में ‘राजनीतिक लचीलापन‘ आ गया, तो फुटबॉल भी वही रुख अख्तियार कर लेगा जो दुनिया की अन्य वैश्विक संस्थाएं करती हैं– जहाँ ताकतवर का नियम चलता है और कमज़ोर को सज़ा मिलती है। यह वही अमेरिकी पाखंड है, जहाँ एक तरफ वे खुद को ‘लोकतंत्र और नियमों का रक्षक‘ बताते हैं, और दूसरी तरफ खेल के सबसे बुनियादी नियम को अपनी ताकत से कुचल देते हैं।

फीफा अगर वास्तव में ईमानदार है, तो उसे तुरंत इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, या कम से कम स्पष्ट मानदंड तय करने चाहिए कि किन असाधारण परिस्थितियों में सज़ा को स्थगित किया जा सकता है। पर मौजूदा स्थिति से साफ है कि ‘सस्पेंडेड बैन‘ का असल मतलब सिर्फ ‘अमेरिकी बैन‘ है। जब बाकी देशों के खिलाड़ी लाल कार्ड पाते हैं, तो उन्हें अगला मैच गँवाना पड़ता है– चाहे उनका कद कितना भी बड़ा क्यों न हो। पर अमेरिकी खिलाड़ी के लिए अलग कानून? यह खुलेआम दोहरा मापदंड है।

फुटबॉल के आम प्रशंसकों के लिए यह दृश्य बेहद चुभने वाला था। लाखों दर्शकों ने टीवी पर देखा कि जिस बालोगन को स्टैंड्स में होना चाहिए था, वह मैदान पर गोल करने की कोशिशों में जुटा था। बेल्जियम के खिलाड़ी और उनके समर्थक इस अन्याय को चुपचाप सहने पर मजबूर थे, क्योंकि वे जानते थे कि महाशक्ति अमेरिका के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना बेअसर साबित होगा। यह अमेरिकी ‘सॉफ्ट पावर‘ का वह चेहरा है, जो दिखता तो खेल-भावना और मुस्कान जैसा है, पर भीतर से एक तानाशाही दबाव की तरह काम करता है।

बहरहाल, इस घटना ने एक बात साबित कर दी है– अमेरिका की नज़र में विश्व कप सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि अपने वैश्विक प्रभुत्व को प्रदर्शित करने का एक और मंच है। जिस तरह वे संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधियों में अपनी मर्जी चलाते हैं, ठीक वैसे ही अब फुटबॉल के मैदान पर भी कर रहे हैं। लेकिन मैदान का हर एक तिनका गवाह है कि नियमों का गला घोंटकर हासिल की गई जीत कभी असली नहीं होती। मुमकिन है कि बेल्जियम यह मैच हार गया हो, लेकिन न्याय के पैमाने पर अमेरिका की हार हुई है।

एक सामान्य दर्शक के तौर पर मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि फुटबॉल हम सबकी साझी विरासत है। इसे किसी एक देश की ‘प्रायोजित जागीर‘ न बनने दें। अगर फीफा ने इस प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाई, तो कल कोई और शक्तिशाली देश भी अपने खिलाड़ियों के लिए ऐसे ही ‘सस्पेंडेड बैन‘ की मांग करेगा, जिससे नियमों का पूरा ढांचा ही बेतुका हो जाएगा। इसलिए आज अमेरिका की इस हरकत पर गंभीर होने के साथ-साथ तरस भी खाना चाहिए, क्योंकि यह फुटबॉल की साख के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है। जो लोग इस फैसले को ‘नियमों की फ्लेक्सिबिलिटी‘ कहकर सही ठहरा रहे हैं, वे या तो बेहद मासूम हैं या फिर इस साम्राज्यवादी खेल के मूक हिस्सेदार।

अंत में, हम इस उम्मीद के साथ बात खत्म करते हैं कि फीफा अपनी इस ऐतिहासिक भूल को सुधारेगा। पर अगर वह ऐसा नहीं करता, तो दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमी खुद इसका जवाब देंगे– स्टेडियमों में आवाज़ उठाकर, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बात रखकर और खेल के प्रति अपनी निष्ठा को बनाए रखकर। क्योंकि हम जानते हैं कि नियमों के बिना कोई भी खेल महज़ एक हुड़दंग है, और साम्राज्यवादी चालों के आगे घुटने टेकना खेल की सबसे बड़ी तौहीन है। जय हो फुटबॉल की, जय हो निष्पक्षता की! मैदान को अपने अहंकार की काली छाया से दूर रखे अमेरिका।

 (लेखक: रमेश शर्मा)

 

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