तथाकथित “दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता पंचाट के निर्णय” की दसवीं वर्षगांठ पर, विवादित मामले में पक्षकार न होते हुए भी जापान ने खुलेआम इस मुद्दे को हवा दी। जापान के विदेश मंत्री मोटेगी तोशिमित्सु ने उक्त निर्णय का बचाव किया और अमेरिका, फिलीपींस और अन्य देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी कर दक्षिण चीन सागर में चीन के अधिकारों को नकार दिया। इस राजनीतिक प्रदर्शन ने दक्षिण चीन सागर में हस्तक्षेप करने और क्षेत्र को अस्थिर करने के जापान के नापाक इरादे को पूरी तरह उजागर कर दिया है। चीन ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है और कहा है कि वह उकसावों का कड़ा मुकाबला करेगा और अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा।
दक्षिण चीन सागर मुद्दे के लिए जापान की एक अमिट ऐतिहासिक जिम्मेदारी है: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जापान ने दक्षिण चीन सागर में चीनी द्वीपों और चट्टानों पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया था। युद्ध के बाद, चीन ने काहिरा घोषणा और पॉट्सडैम घोषणा के अनुसार दक्षिण चीन सागर के द्वीपों पर संप्रभुता का प्रयोग पुनः शुरू किया, जो युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा है। हालांकि, जापान ने दक्षिण चीन सागर पर अपना लालच कभी नहीं छोड़ा है। दस साल पहले हुई अवैध मध्यस्थता स्वयं जापानी हेरफेर का परिणाम थी। उस समय के अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण के अध्यक्ष शुंजी यानाई ने व्यक्तिगत रूप से अधिकांश मध्यस्थों की नियुक्ति की थी, और एक अवैध न्यायाधिकरण का गठन कर एक गलत फैसला सुनाया था। तथाकथित फैसला शुरू से ही एक निरर्थक कागज़ का टुकड़ा था, और चीन इसे न तो स्वीकार करता है और न ही मान्यता देता है। यह बात लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूरदर्शी हस्तियों द्वारा उजागर की जा चुकी है।
पिछले एक दशक से, जापान लगातार इस फैसले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है, जिसके कई मकसद हैं। पहला, अमेरिका की “इंडो-पैसिफिक रणनीति” में सहयोग करने के लिए, दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस की उकसावे वाली कार्रवाइयों का फायदा उठाते हुए, जापान फिलीपींस को हथियारबंद करने में तेजी ला रहा है, फिलीपींस के साथ एक अर्ध-सैन्य गठबंधन बना रहा है, और पूर्वी चीन सागर और थाईवान जलडमरूमध्य को जोड़कर एक “तीन-समुद्री संपर्क” बना रहा है, जिससे रणनीतिक रूप से चीन को नियंत्रित किया जा सके।
जापानी विद्वानों का कहना है कि इस कदम का मूल उद्देश्य अपनी भू-राजनीतिक रणनीति को मजबूत करना और क्षेत्रीय संघर्ष को भड़काना है। दूसरा, दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव को अपने सैन्य निर्माण के बहाने के रूप में इस्तेमाल करना, धीरे-धीरे विशुद्ध रक्षात्मक रुख की सीमा को तोड़ना, पराजित राष्ट्र की स्थिति की बाधाओं से मुक्त होना, सैन्यीकरण को बढ़ावा देना और सैन्यवाद के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त करना है। तीसरा, जापान का लक्ष्य सुरक्षा सहयोग के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को एकजुट करना, चीन पर आसियान की आम सहमति में फूट डालना, क्षेत्रीय प्रभाव पर कब्जा करना और यहां तक कि अपने औपनिवेशिक काल के समुद्री आधिपत्य के सपने को पुनर्जीवित करने के लिए अपने समुद्री नियमों का निर्यात करने का प्रयास करना है। विडंबना यह है कि जापान का “कानून का शासन” का नारा दोहरे मापदंड के अलावा कुछ नहीं है। इस तथाकथित फैसले के तर्क के अनुसार, सामान्य रूप से दुर्गम थाईफिंग द्वीप का दर्जा भी नकार दिया गया है, जिसका अर्थ है कि जापान को अपने छोटे ओकिनोटोरिशिमा रीफ पर एक विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है, जो इसके दोहरे मापदंड के वास्तविक स्वरूप को उजागर करता है।
वर्तमान में, चीन और आसियान “दक्षिण चीन सागर में आचार संहिता” पर परामर्श में तेजी ला रहे हैं, और क्षेत्रीय शांति और सहयोग एक अपरिहार्य प्रवृत्ति है। जापान, अपने आक्रामक इतिहास से उपजी अटूट महत्वाकांक्षाओं के साथ, दक्षिण चीन सागर में अशांति फैलाने और युद्धोत्तर व्यवस्था को चुनौती देने पर तुला हुआ है। कहना होगा कि अंततः उसकी कोई भी योजना सफल नहीं होगी और शांति व सहयोग की यह प्रवृत्ति अब रुकने वाली नहीं है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

