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मैजिक ऑफ ताल: ताल की जादुई दुनिया से रूबरू हुए पेइचिंग के संगीत प्रेमी

Magic of Taal: पेइचिंग में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित तबला वर्कशॉप श्रृंखला संगीत और संस्कृति के प्रति उत्साही लोगों को लगातार आकर्षित कर रही है। इसी क्रम में 6 जून को आयोजित विशेष कार्यक्रम “मैजिक ऑफ़ ताल” ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की लयात्मक परंपरा को एक नए और रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन भारतीय तबला वादक और गायक सुरम्य पुशन दासगुप्ता ने किया।

उन्होंने प्रतिभागियों को तबले की समृद्ध परंपरा और भारतीय संगीत में ताल की केंद्रीय भूमिका से परिचित कराया। कार्यशाला के दौरान उपस्थित लोगों ने केवल तबले के इतिहास और संरचना के बारे में ही नहीं जाना, बल्कि भारतीय संगीत की विभिन्न ताल प्रणालियों का भी अनुभव किया। सुरम्य पुशन दासगुप्ता ने प्रतिभागियों को पाँच प्रमुख तालों- दादरा, केहरवा, रूपक, झपताल और तीनताल की विशेषताओं और उनके प्रयोग के बारे में विस्तार से बताया। प्रत्येक ताल की संरचना, उसकी लयात्मक पहचान और भारतीय संगीत में उसकी भूमिका को सरल और आकर्षक तरीके से समझाया गया। लाइव डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से उन्होंने यह दिखाया कि किस प्रकार अलग-अलग तालें संगीत में भाव, गति और ऊर्जा का संचार करती हैं।

“रिदम एज़ ए यूनिवर्सल लैंग्वेज कनेक्टिंग कल्चर्स”अर्थात “लय एक ऐसी सार्वभौमिक भाषा है जो संस्कृतियों को जोड़ती है”विषय पर केंद्रित इस कार्यशाला का उद्देश्य संगीत के माध्यम से भारत और चीन के लोगों के बीच सांस्कृतिक संवाद को और मजबूत बनाना था। कार्यक्रम में गहन जानकारी, प्रत्यक्ष प्रदर्शन और सहभागितापूर्ण शिक्षण का अनूठा संयोजन देखने को मिला, जिससे प्रतिभागियों को केवल सुनने ही नहीं बल्कि स्वयं ताल को महसूस करने और समझने का अवसर मिला। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक प्रश्न पूछे, तालों की गिनती और बोलों का अभ्यास किया तथा तबले की विभिन्न ध्वनियों और तकनीकों को नज़दीक से समझा। इस इंटरैक्टिव माहौल ने कार्यक्रम को और भी जीवंत बना दिया।

भारतीय तबला विश्व के सबसे प्रसिद्ध ताल वाद्यों में से एक माना जाता है। इसकी जटिल लय संरचनाएँ और अभिव्यक्ति की व्यापक संभावनाएँ इसे भारतीय संगीत की पहचान बनाती हैं। “मैजिक ऑफ़ ताल”जैसी पहलें न केवल इस विरासत को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाती हैं, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी समझ और सम्मान को भी बढ़ावा देती हैं। पेइचिंग में आयोजित यह कार्यशाला एक बार फिर इस बात का प्रमाण बनी कि संगीत की भाषा सीमाओं से परे होती है। जब शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती, तब लय और सुर स्वयं संवाद का माध्यम बन जाते हैं।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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