मई 2026 चीन की “राष्ट्राध्यक्ष कूटनीति” के लिए एक ऐतिहासिक महीना बनकर उभर रहा है। केवल 4 दिनों के अंतराल में पेइचिंग ने साल की दो सबसे चर्चित कूटनीतिक मुलाक़ातों की मेज़बानी की। 13 से 15 मई तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन का राजकीय दौरा किया, जिसने वैश्विक मीडिया और कूटनीतिक गलियारों का ध्यान खींचा।
अब, राष्ट्रपति शी चिनफिंग के निमंत्रण पर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 19-20 मई को पेइचिंग की राजकीय यात्रा पर आ रहे हैं। पुतिन का यह दो -दिवसीय दौरा महज़ औपचारिकता नहीं है। यह “नए युग के लिए चीन-रूस सर्वांगीण रणनीतिक साझेदारी सम्बंध”को और गहरा करने की दिशा में एक अहम कदम है—ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तेज़ हो रही है और वैश्विक व्यवस्था लगातार बदल रही है। दोनों देशों के लिए यह मुलाक़ात उनकी रणनीतिक साझेदारी में निरंतरता का संकेत देती है, जबकि , बाकी दुनिया यह देख रही है कि बदलते हालात में यह साझेदारी चीन-रूस संबंधों की दिशा कैसे तय करती है।
गौरतलब है कि 2026 चीन-रूस सर्वांगीण रणनीतिक साझेदारी सम्बंध की 30वीं वर्षगांठ और ‘सद्भावना एवं मैत्रीपूर्ण सहयोग संधि’की 25वीं वर्षगांठ का वर्ष है, जो दोनों देशों के आपसी संबंधों का आधार है। इसी पृष्ठभूमि में पुतिन की पेइचिंग यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों के संपूर्ण आयामों की समीक्षा करना और तेज़ी से बदलते व्यापार-प्रौद्योगिकी परिदृश्य तथा जटिल भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच सहयोग के नए अवसर तलाशना है। यूक्रेन और ईरान में जारी संघर्षों के चलते वैश्विक समीकरण और भी जटिल हो गए हैं, ऐसे में पुतिन की चीन यात्रा का रणनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।
पेइचिंग यात्रा से पहले क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि यह दौरा भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर दोनों देशों के रुख को संरेखित करने के लिहाज से “सारगर्भित” होगा, क्योंकि दोनों पक्ष इसे “अत्यधिक महत्व” दे रहे हैं। मार्च 2013 में जब शी चिनफिंग चीन के राष्ट्रपति बने, तो रूस ही पहला देश था जिसे उन्होंने चुनकर दौरा किया।
इतनी बार-बार की मुलाक़ातें बताती हैं कि दोनों नेताओं के बीच केवल औपचारिक संबंध नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और राजनीतिक तालमेल का एक स्थायी ताना-बाना बुना जा चुका है। इसी विश्वास की बदौलत, पेइचिंग और मॉस्को अपने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने और उन्हें एक ऊँचे रणनीतिक स्तर तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं—और यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों में शांति को प्राथमिकता देने की बात हो तो चीन ने अपनी उपस्थिति साफ तौर पर दर्ज कराई है। पड़ोसियों के प्रति उसकी शांति-उन्मुख विदेश नीति, चीन के लिए सिर्फ़ दावे की बजाय एक ज़िम्मेदार बड़ी शक्ति की भूमिका को व्यवहार में साबित करने का तरीका है।
यही दृष्टिकोण चीन-रूस संबंधों को महज़ लेन-देन तक सीमित नहीं रहने देता। पिछले सितंबर में शांगहाई सहयोग संगठन (एससीओ) के थ्येनचिन शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति शी ने पुतिन से कहा था कि चीन-रूस संबंध अब बड़ी शक्तियों के बीच संबंधों का एक आदर्श बन गए हैं—स्थायी सद्भावना, गहरे रणनीतिक समन्वय और परस्पर लाभ पर आधारित।
दूसरी ओर, पुतिन ने रूस-चीन संबंधों को ‘अभूतपूर्व’ करार देते हुए कहा, “हमारा करीबी संवाद संबंधों के रणनीतिक स्वरूप को दर्शाता है, जो अभूतपूर्व रूप से उच्च स्तर पर हैं।” यह कोई आकस्मिक टिप्पणी नहीं है। फरवरी 2022 की चीन-रूस संयुक्त विज्ञप्ति में दोनों देशों ने स्पष्ट किया था कि “मित्रता की कोई सीमा नहीं है और सहयोग के लिए कोई वर्जित क्षेत्र नहीं है।” वही रुख आज भी संबंधों की दिशा तय कर रहा है।
जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ और बढ़ती अलगाववादी नीतियों ने वैश्विक व्यवस्था को हिला कर रख दिया है, तो इसी पृष्ठभूमि में पुतिन की यह यात्रा और भी अर्थपूर्ण लगती है। यह यात्रा आर्थिक साझेदारी में तेज़ वृद्धि के बीच हो रही है— 2025 में द्विपक्षीय व्यापार $228.1 बिलियन तक पहुँच गया, और इस साल की पहली तिमाही में ही यह $61.2 बिलियन रहा, जो साल-दर-साल 14.7% की बढ़ोतरी दर्शाता है।
यह रुझान स्पष्ट करता है कि रूस लंबे समय से चीन का करीबी रणनीतिक साझेदार रहा है और तेल-गैस का सबसे बड़ा विदेशी आपूर्तिकर्ता भी बना हुआ है। चीन और रूस के बीच लगभग 95% लेन-देन अमेरिकी डॉलर के बजाय युआन और रूबल में निपटाए जाते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि शी और पुतिन के रणनीतिक मार्गदर्शन में चीन-रूस संबंधों ने “अंतरराष्ट्रीय बदलावों की कसौटी पर खरा उतरना” साबित किया है।
पेइचिंग में पुतिन का दो दिन का प्रवास प्रतीकात्मक से कहीं आगे जाता है। राष्ट्रपति शी से होने वाली बातचीत में द्विपक्षीय मुद्दों के साथ-साथ व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग को गहरा करने पर विशेष जोर रहेगा।
कार्यक्रम में चीनी प्रधानमंत्री ली छ्यांग से मुलाकात भी शामिल है, जिसमें व्यापार-आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, हाई टेक्नोलॉजी, ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा होगी। यह पूरी रूपरेखा दिखाती है कि चीन और रूस की व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग ने एक सकारात्मक गति पकड़ ली है—और दोनों पक्ष इसे आगे बढ़ाने में गंभीर हैं।
निष्कर्षतः, पुतिन की चीन यात्रा एक ऐतिहासिक पड़ाव साबित होगी, जो ऐतिहासिक भरोसे को भविष्य-उन्मुख आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों से जोड़ती है। अब तक, दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के रणनीतिक मार्गदर्शन में चीन और रूस के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के सार्थक परिणाम सामने आए हैं।
ब्रिक्स और एससीओ के सदस्य होने के नाते, चीन और रूस इन बहुपक्षीय मंचों का इस्तेमाल वैश्विक दक्षिण के साझा लक्ष्यों के अनुरूप रणनीतिक समन्वय बढ़ाने, यूरेशियाई सुरक्षा परिदृश्य को स्थिर करने और एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाने के लिए कर रहे हैं—जो पश्चिमी आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व को संतुलित कर सके। यह उम्मीद की जा सकती है कि दोनों देशों के नेताओं के नेतृत्व में चीन-रूस संबंधों का यह रणनीतिक तालमेल आने वाले वर्षों तक वैश्विक शक्ति-संतुलन का एक निर्णायक स्तंभ बना रहेगा।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— रविशंकर बसु)

