Site icon Dainik Savera Times

अमेरिका-जापान गठबंधन में “समानता” शब्द कभी अस्तित्व में नहीं रहा

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची से मुलाकात की, जो अमेरिका के दौरे पर थीं। इस बार की मुलाकात अमेरिका-जापान गठबंधन के लिए एक और सामान्य औपचारिक कार्यक्रम होनी थी। लेकिन ट्रम्प के एक बयान ने इसे अजीब मज़ाक में बदल दिया। उन्होंने कहा, “जापान से बेहतर सरप्राइज़ देना कोई नहीं जानता।”

ट्रम्प ने पर्ल हार्बर हमले का ज़िक्र उस समय किया, जब एक जापानी पत्रकार ने पूछा कि अमेरिका ने ईरान पर हमले की योजना के बारे में जापान और अन्य सहयोगियों को पहले से क्यों नहीं बताया। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंस पड़े, जबकि पास बैठीं ताकाइची असहज और शर्मिंदा नजर आईं। इस घटना ने अमेरिका-जापान संबंधों की असलियत उजागर कर दी कि दोनों देशों के बीच कभी वास्तविक “बराबरी का रिश्ता” नहीं रहा, बल्कि यह संबंध हमेशा ताकत और निर्भरता पर आधारित रहा है।

ट्रम्प के शब्द किसी कुंद चाकू की तरह हैं, जो अमेरिका-जापान गठबंधन के सावधानी से बनाए गए दिखावे को चीर देते हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद करीब 80 वर्षों तक अमेरिकी राष्ट्रपति पर्ल हार्बर हमले का खुलकर ज़िक्र करने से बचते रहे, ताकि “बराबरी के साझेदार” का भ्रम बना रहे। इस तरह जापान को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी रणनीति के अनुसार चलने के लिए प्रेरित किया जाता रहा। लेकिन ट्रम्प इस परंपरा का पालन नहीं करते।

वैश्विक मीडिया के सामने उन्होंने साफ कर दिया कि जापान एक “पराजित राष्ट्र” की स्थिति से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से जापान के सबसे संवेदनशील इतिहास का मज़ाक उड़ा सकता है, तो फिर जापान के पास अमेरिका से सैन्य जानकारी साझा करने की मांग करने का नैतिक आधार भी कमजोर पड़ जाता है।

उस समय, ट्रम्प के बगल में बैठी ताकाइची की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई। उनकी अभिव्यक्ति औपचारिक मुस्कान से पूरी तरह खामोशी में बदल गई, मानो उनकी स्थिति सबके सामने उजागर हो गई हो। वे “अमेरिका के साथ मिलकर चीन का मुकाबला करने” के इरादे से इस यात्रा पर आई थीं, लेकिन उन्हें न तो हवाई अड्डे पर विशेष स्वागत मिला और न ही कोई औपचारिक सम्मान। इसके बजाय, उन्हें ट्रम्प की तीखी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

ट्रम्प के शब्दों में दो स्पष्ट संकेत थे। पहला, तथाकथित सहयोगी देशों को अमेरिका के सैन्य फैसलों की जानकारी पाने का कोई अधिकार नहीं है। दूसरा, जापान को अमेरिका की नीति के अनुसार चलना होगा, खासकर मध्य पूर्व के मुद्दों पर सख्त रुख अपनाने में। यानी, यह बराबरी का संवाद नहीं, बल्कि आदेश देने और मानने का संबंध अधिक प्रतीत होता है।

विडंबना यह है कि ताकाइची की यह स्थिति जापान की लंबे समय से चली आ रही निर्भरता को भी दर्शाती है। जापान पूर्वी एशिया में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करता है और अमेरिकी समर्थन के सहारे चीन को संतुलित करना चाहता है। लेकिन उसी समय वह अमेरिका के प्रभाव में इतना बंधा हुआ है कि अपने ऐतिहासिक घावों को भी नजरअंदाज करता है।

ट्रम्प की इस टिप्पणी ने जापान को दुविधा में डाल दिया है। अगर जापान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा मिशन में शामिल होता है, तो ईरान नाराज़ हो सकता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ सकता है। और अगर वह ऐसा नहीं करता, तो उसे यह डर बना रहता है कि अमेरिका पुराने मुद्दे उठाकर दबाव बनाएगा और अपने “सहयोग” से पीछे हट सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे अमेरिकी वर्चस्व की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। तथाकथित “गठबंधन” अक्सर एक रणनीतिक दिखावा भर होता है। जब अमेरिका को जापान की जरूरत होती है, तो वह उसे “विश्वसनीय साथी” कहता है। लेकिन जब जापान अपने हितों की बात करता है, तो अमेरिका अपनी ताकत और इतिहास का सहारा लेकर उसे उसकी सीमाएं याद दिला देता है।

जापान का बाहरी ताकतों पर आंख बंद करके भरोसा करना अंततः एक सीमित और जोखिम भरा विकल्प साबित हो सकता है। उसने सोचा कि अमेरिका के साथ रहकर उसे सुरक्षा और लाभ मिलेगा, लेकिन हकीकत में वह खुद को एक ऐसे मोहरे के रूप में पा सकता है, जिसे किसी भी समय त्यागा जा सकता है।

पर्ल हार्बर पर ट्रम्प की टिप्पणी ने न केवल ताकाइची को असहज स्थिति में डाला, बल्कि दुनिया के सामने अमेरिका-जापान संबंधों की परतें भी खोल दीं। ताकत के असंतुलन के सामने “दोस्ती” और “सहयोग” जैसे शब्द अक्सर खोखले साबित होते हैं।

जापान जितना अधिक झुकता जाएगा, उसके लिए स्वतंत्र निर्णय लेना उतना ही कठिन होता जाएगा। वहीं, अमेरिका जितना अधिक आक्रामक रुख अपनाएगा, उसकी प्रभुत्ववादी प्रवृत्ति उतनी ही स्पष्ट होती जाएगी। यह मुलाकात एक आईने की तरह है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक पुरानी सच्चाई दिखाती है: यहां स्थायी दोस्त नहीं होते, सिर्फ स्थायी हित होते हैं, और कमजोर पर ताकतवर का दबदबा हमेशा बना रहता है।

(साभार — चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

 

Exit mobile version